स्वर्गप्रवास से लौटे कोटगढ़ के चतुर्मुख देवता, प्रजा को सुनाया वर्ष फल

डा. हिमेन्द्र बाली “हिम” शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

शिमला जिले की उप तहसील कोटगढ़ के देव संस्कृति के अधिष्ठाता देव चतुर्मुख कोटगढ़-कोटखाई, खनेटी और करांगला रियासतों के राज परिवार के कुलदेव हैं और इन क्षेत्रों के सांस्कृतिक व धार्मिक जीवन के जीवन प्राण हैं। आज से साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व देव चतुर्मुख के गुरू महान तपस्वी तानुजुब्बल में प्रतिष्ठित खाचली नाग ने नरभक्षी काणा देव का सर्वनाश कर देव चतुर्मुख को ननखड़ी के खड़ाहण से यहां आने के लिए प्रेरित कर प्रतिष्ठित किया। देव चतुर्मुख हर वर्ष माघ संक्राति को पंद्रह माघ तक स्वर्ग प्रवास पर जाते है। सतलुज, ब्यास व पब्बर घाटी में कई देव माघ महीने में सात, पंद्रह व एक महीने के लिए स्वर्ग प्रवास पर जाते हैं। कुल्लू के बाहरी सराज के अस्सी प्रतिशत देवता स्वर्ग प्रवास पर रहते हैं। बड़ागांव सांगरी व सुकेत क्षेत्र के देव भी स्वर्ग प्रवास पर जाते हैं और वापस आने पर वर्ष भर का फलाफल सुनाते हैं।

देवताओं के माघ महीने में स्वर्ग प्रवास के अतिरिक्त यह भी धारणा है कि देवता बुशैहर सराहन के समीप बौंडा में असुरों से युद्ध करने जाते हैं। असुरों से युद्ध कर देवता अपनी प्रजा के लिए सुफल लेकर आते हैं। जब देव अपनी प्रजा के सुख-सौख्य के लिए संघर्ष करते हैं, वहीं लोग अपने देवताओं के श्रीविग्रह पर घी-मक्खन को आलेपित कर युद्ध में लगे घावों पर मरहम लगाकर घृतमा लगाते हैं। का़गड़ा में बज्रेश्वरी माता के विग्रह पर माघ संक्रांति को घृत मण्डल का श्रृंगार जालंधर दैत्य से युद्ध में लगे घाव को मिटाने के लिए लगता है। देव चतुर्मुख मंदिर में माघ संक्राति से पूर्व दिवस को देवता के लिंग विग्रह का जल से प्रक्षालन कर उस पर सरसों के तेल से आलेपन किया जाता है। देवता के अतिरिक्त नरोल की माता शराई कोटी की चतुर्भुज माता, कदारी माता व चतुर्मुख देवता के मुख्य विग्रह और अन्य मूर्तियों का विधिपूर्वक प्रक्षालन किया जाता है। संक्रांति के दिन ब्रह्म मुहूर्त में नधईक वंश के पुजारी देव चतु्र्मुख व शक्ति की पूजा करते हैं। नये वस्त्राभूषण देवी देवता को अर्पित किए जाते हैं। देव चतुर्मुख को लोग घरों से घी जिसे “खोड़ी” कहते हैं, अर्पित करते हैं। खोड़ी एक तरह का देवता को अर्पित किया जाने वाल महसूल है, जो देवता की भूमि के बदले लिए जाने की परम्परा है।


माघ संक्रांति को गांव की कन्याएं कदारी माता को प्रसन्न करने लिए दुल्हा-दुल्हन का आंगी-शणागी का अभिनय करतीं हैं। यदि किसी कारण आंगी-शणागी की रस्म माघ संक्रांति को आयोजित न हो सके, तो यह परम्परा पंद्रह माघ के दिवस सम्पन्न की जाती है, जब देव चतुर्मुख देवासुर संग्राम से अपने मंदिर लौटते हैं। खोड़ी के घी को एक बर्तन में रखकर देवता के लिंग विग्रह के पास रखा जाता है। विग्रह के गर्भ गृह के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। गर्भ गृह के कपाट सांतवें दिन खोले जाते हैं और घी का एक भाग प्रजा को और शेष भाग मंदिर के भण्डार में रखा जाता है। संक्राति के दिन देवता का गूर देवारोहण में सारी प्रजा के कल्याण का वरदान देता है। देवता के अधीनस्थ देव भौड़ के प्रतिनिधि भी देवारोहण में अपने कल्याण की याचना करते हैं। माघ संक्रांति के दिन अपराह्न चार बजे वाद्य यंत्रों की धुन पर देवता को स्वर्गप्रवास के लिए विदा किया जाता है। पंद्रह माघ को पूर्वाह्न वाद्य यंत्रों की स्वागत धुन पर चतुर्मुख देवता के आगमन का उत्सव मनाया जाता है, तदोपरांत देवता का गूर भावावेश में देवासुर संग्राम में अपनी हार-जीत का वृतांत सुनाकर वर्ष भर की भविष्य वाणी करता है। इस वर्ष देव चतुर्मुख ने यह भविष्यवाणी की, कि इस बार दो बार अभी बर्फ गिरेगी और उनके गुरू खाचली नाग देवासुर संग्राम से ओलावृष्टि लाये हैं। कभी अतीत में सी भविष्यवाणियां भी हुई हैं, जब देवता ने कहा कि युद्ध में वे अपनी घंटी खो गए। ऐसे में देवता के पुजारी पर काल संकट निश्चित है। यदि देवता ने अपने ढोली अर्थात् ढोल वादक को दाव पर लगाया तो यह सम्भावना है कि अमुक व्यक्ति पर काल संकट आयेगा। सूर्य के मकर राशि में विचरण करने के कारण माघ महीने को धर्म का महीना माना जाता है। देवता के श्रीविग्रह पर घृतमा का अभिषेक और  देवता द्वारा अपनी प्रजा के कल्याण के लिए असुरों से  संघर्ष हिमालयी क्षेत्र की देव परम्परा का परिचायक है।

इतिहासविद व साहित्यकार कुमारसैन (शिमला) हिमाचल प्रदेश

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