यूँ ही चला चल

नीरज त्यागी `राज`, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। 

हर  रोज  सुबह  की  ठंडी किरन,
उम्मीदों का कोहरा ओढ़े आती है।
मनमोहक  धूप  की  गर्मी  पाकर,
हर  उम्मीद  फिर  मुस्कुराती  है।।
समेटना होगा हर आस को एहसासों से,
जिंदगी हर पल बस यही सिखलाती है।
बार – बार ये खुशियो का एहसास नही आता है।
खुश है वही जो इन एहसासों को सम्हाल पाता है।।
लड़ने-झगड़ने में सभी रिश्ते धीरे-धीरे छूट जाते है।
छोड़ कर जाने वाले लोग फिर कभी ना मिल पाते है।।
दर्द हर बार बढ़ते कदमो को अगर रोकने लगे।
साथ जो भी चले,उसको कभी रोकते नही है।।
अगर काँटो की परवाह करने लगे गुलाब की डाली।
फिर  कैसे  उस  गुलिस्तां  पर  महकते गुलाब लगे।।
ऐसा कोई नही जिसका जीवन दर्द से भरा ना हो।
फिर तू पलट कर क्यों केवल अपने दर्द ही जीता है।।
बीते हुए पलो से खुशियो के पल समेटना होगा।
जीवन के चक्र ने अगर अभी चलना नही छोड़ा।
चलता चल तू भी जब तक ये कदम खुद ना रुके।।
65/5 लाल क्वार्टर राणा प्रताप स्कूल के सामने ग़ाज़ियाबाद उत्तर प्रदेश

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