शिवपुराण से……. (274) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


यज्ञदत्त-कुमार को भगवान् शिव की कृपा से कुबेरपद की प्राप्ति तथा उनकी भगवान् शिव के साथ मैत्री

गतांक से आगे………..
इस प्रकार उसने दस हजार वर्षों तक तपस्या की। तदन्तर विशालाक्षी पार्वती देवी के साथ भगवान् विश्वनाथ कुबेर के पास आये। वे शिवलिंग में मन को एकाग्र करके ठूंठे काठ की भांति स्थिर भाव से बैठे थे। भगवान् शिव ने उनसे कहा-अलकापते! मैं वर देने के लिए उद्यत हूं। तुम अपना मनोरथ बताओ।
यह वाणी सुनकर तपस्या के धनी कुबेर ने ज्यों ही आंखे खोलकर देखा, त्यों ही उमावल्लभ भगवान् श्रीकण्ठ सामने दिखायी दिये। वे उदयकाल के सहस्रों सूर्यों से भी अधिक तेजस्वी थे और उनके मस्तक पर चन्द्रमा अपनी चांदनी बिखेर रहे थे। भगवान् शंकर के तेज से उनकी आंखे चौधिया गयीं। उनका तेज प्रतिहत हो गया और वे नेत्र बन्द करके मनोरथ से भी परे विराजमान देवदेवेश्वर शिव से बोले-नाथ! मेरे नेत्रों को वह दृष्टिशक्ति दीजिये, जिससे आपके चरणारविन्दों का दर्शन हो सके। स्वामिन्! आपका प्रत्यक्ष दर्शन हो, यही मेरे लिए सबसे बड़ा वर है। ईश! दूसरे किसी वर से मेरा क्या प्रयोजन। चन्द्रशेखर! आपको नमस्कार है।
कुबेर की यह बात सुनकर देवाधिदेव उमापति ने अपनी हथेली से उनका स्पर्श करके उन्हें देखने की शक्ति प्रदान की। दृष्टिशक्ति मिल जाने पर यज्ञदत्त के उस पुत्र ने आंखे फाड़-फाड़कर पहले उमा की ओर देखना आरम्भ किया। वह मन ही मन सोचने लगा कि भगवान् शंकर के समीप यह सर्वांगसुन्दरी कौन है?

(शेष आगामी अंक में)

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