शिवपुराण से……. (273) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


यज्ञदत्त-कुमार को भगवान् शिव की कृपा से कुबेरपद की प्राप्ति तथा उनकी भगवान् शिव के साथ मैत्री

गतांक से आगे………..

अब एकचित्त होकर सुनो कि किस प्रकार सदा के लिए उसकी भगवान् शिव के साथ मित्रता हो गयी। मैं इस प्रसंगका तुमसे वर्णन करता हूं।
नारद! पहले के पाद्यकल्प की बात है, मुझे ब्रह्मा के मानस पुत्र पुलस्त्य से विश्रवा का जन्म हुआ और विश्रवा के पुत्र वैश्रवण (कुबेर) हुए। उन्होंने पूर्वकाल में अत्यन्त उग्र तपस्या के द्वारा त्रिनेत्रधारी महादेव की आराधना करके विश्वकर्मा की बनायी हुई इस अलकापुरी का उपभोग किया। जब वह कल्प व्यतीत हो गया और मेघवाहनकल्प आरम्भ हुआ, उस समय वह यज्ञदत्त का पुत्र जो प्रकाश का दान करने वाला था, कुबेर के रूप में अत्यन्त दुस्सह तपस्या करने लगा। दीपदान मात्र से मिलने वाली शिवभक्ति के प्रभाव को जानकर वह शिव की चित्प्रकाशिका काशिकापुरी में गया और अपने चित्तरूपी रत्नमय प्रदीपों से ग्यारह रूद्रोंको उद्बोधित करके अनन्यभक्ति एवं स्नेह से संपन्न हो वह तन्मयतापूर्वक शिव के ध्यान में मग्न हो निश्छलभाव से बैठ गया। जो शिव की एकता का महान पात्र है, तपरूपी अग्नि से बढ़ा हुआ है, काम-क्रोधादि महाविध्नरूपी पतंगों के आघात से शून्य है, प्राणनिरोधरूपी वायुशून्य स्थान में निश्छलभाव से प्रकाशित है, निर्मल दृष्टि के कारण स्वरूप से भी निर्मल है तथा सद्भावरूपी पुष्पों से जिसकी पूजा की गयी है, ऐसे शिवलिंग की प्रतिष्ठा करके वह तब तक तपस्या में लगा रहा, जब तक उसके शरीर में केवल अस्थि और चर्ममात्र ही अवशिष्ट नहीं रह गये।

(शेष आगामी अंक में)

Related posts

Leave a Comment