रमणीय हैं मैहरन के पारम्परिक शैली के घर

डा.हिमेन्द्र बाली, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

मण्डी जिले के करसोग उप मण्डल में स्थित मैहरन गांव सुकेत के आराध्य नाग मांहू के अधीनस्थ मशाणु के आधिपत्य के लिए विख्यात है। गांव में पहाड़ी शैली के कई घर आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं, इन घरों की शैली शुद्ध पहाड़ी है। पहाड़ों की ढलवां छत शैली खश शैली के अंतर्गत आती है। चौंकाने वाला पहलू तो यह है कि मैहरन के परिवार अब धरोहर घरों को छोड़ कर कंकरीट के मकानों में रह रहे हैं, जबकि पहाड़ों की पहचान ये पुराने मकान बिना रखरखाव के ध्वस्त होने की कगार पर है़। ये मकान द्विमंजिला व त्रिमंजिला हैं और दीवारें काठकुणी शैली में बनी भूकम्परोधी हैं। 
पारम्परिक शैली के अनुसार इन मकानों की धरातल मंजिल का प्रयोग ओबरा अर्थात् गौशाला के रूप में होता है। ऊपर की मंजिल में प्रवेश काष्ठ सीढ़ी से होता है। धरातल मंजिल में कमरों के दरवाजे बाहर जहां खुलते हैं, उसे बीह कहते हैं, जो प्राय: मवेशियों को बांधने और घास रखने के लिए प्रयुक्त होती है। दूसरी मंजिल में कमरों में प्रवेश बरामदे से होता है। बरामदे की रेलिंग अर्थात् बाड़न घर का मुख्य श्रृंगार है, बाड़न में काष्ठ फलकों पर सुंदर नमूनों का अंकन सुरम्य है। बाड़न के स्तम्भ गोलाई में शोभनीय श्रृंगारिक प्रारूप लिए हैं, जो घरों के सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं। 
पहाड़ी शैली के इन मकानों की छत्तें प्राय: स्लेट की हैं। घरों के अग्रभाग में सर्दियों में धूप सेंकने और अनाज को सुखाने के लिए काष्ठ स्तम्भों पर अवलम्बित चौकियां बनीं है। घरों में दूसरी मंजिल के ऊपर अर्द्ध मंजिल को दड़क या छांदड़ कहते हैं। इस अर्द्ध मंजिल में प्रवेश ऊंचाई कम होने के कारण झुक कर होता है। प्राय: दड़क पर रसोई हुआ करती है। पहाड़ी परिवेश में यह परम्परा थी कि खाना सदैव पर्दे में पकाया जाना चाहिए। शायद तभी इन पुराने मकानों में रसोई आधी मंजिल पर बनी होती है।


मैहरन में ऐसे धरोहर घर हैं, जिनका शिल्प सहेजने की मांग करता है। घरों के शिल्प को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि इन्हे ग्रामीण पर्यटन के उद्देश्य से संवारा जाए। ऐसे सरकारी प्रयासों से जहां विलुप्त होती पहाड़ी शैली को स्थायित्व प्रदान होगा, वहीं पर्यटन की दस्तक मैहरन गांव तक पहुंचेगी। पर्यटन के साथ साथ मैहरन व पूरे करसोग में यहां की  पारम्परिक गृह शैली का संरक्षण तो होगा ही, वहीं यहां की प्रबुद्ध संस्कृति का विश्व को परिचय मिलेगा।
मैहरन न केवल धरोहर घरों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां की देव परम्परा भी रोचक है। देव मशाणु की यहां एक छत्र सत्ता है। भूत बाधा निवारण के लिए सिद्धहस्त मशाणु के मंदिर में देश-विदेश से लोग माथा टेकने आते हैं। गांव में चोरी के अपराधी को देव मशाणु कठोरतम् दण्ड देने के लिए विख्यात हैं। लोक मान्यता है कि मशाणु मैहरन में दिल्ली से आकर प्रतिष्ठित हुए थे। मैहरन में देव भवन भी अपने पारम्परिक शिल्प के लिए विख्यात हैं। यदि मैहरन के जर्जर हो रहे इन धरोहर घरों का सौंदर्यीकरण कर सुरक्षित रखा जाए तो पर्यटकों, शोधार्थियों व यायावरों को सीखने के लिए यहां विपुल राशि है।
प्रधानाचार्य नारकण्डा (शिमला) हिमाचल प्रदेश

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