वाणी

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

कर्मयोगी संत कबीर दास जी ने वाणी की महिमा को इन शब्दों में व्यक्त किया है-
“वाणी ऐसी बोलिये मन का आपा खोय,,औरन को शीतल करे,आपहुँ शीतल होय”
कुछ इसी मान्यता का पालन करने वाली दक्षिण भारत की एक महिला संत औव्यैयार थीं, जो बचपन में ही अनाथ हो गई थीं। एक सद् गृहस्थ संत जोकि प्रभु भक्ति के गीत रचते थे, उन्होंने इनका पालन पोषण किया था। अपने धर्मपिता के भक्तिगीतों ने औव्यैयार को भगवन भक्ति की प्रेरणा दी। और दस वर्ष की आयु होते ही खुद उन्होंने भी भक्ति गीतों की रचना आरम्भ कर दी थी। अपने ईष्टेश्वर देवता विघ्नेश्वर की पूजा अर्चना में वह लीन रहती थीं। कठोर तप और साधना के बल पर उन्हें आलौकिक सिद्धि प्राप्त हुई। दुःखी बीमार उनके पास पहुँचते तो वह उन्हें जड़ी बूटियों से निर्मित औषधि देतीं और उन्हें भगवान का स्मरण करने, तथा सात्विक जीवन जीकर निरोगी बनने की प्रेरणा देतीं। वह स्वयं गाँवों और शहरों का भ्रमण कर लोगों को सदाचार का उपदेश देतीं। एक बार एक गृहस्थ के द्वार पर भिक्षा मांगने पहुँची। उन्होंने देखा कि पति-पत्नि किसी बात पर झगड़ते हुए एक दूसरे को कटु-वचन कह रहे थे। यह देखकर वह वापस लौटनें लगीं।  गृहस्वामी उन्हें पहचान गया, उसने उन्हें रोका और उनसे भोजन करने की प्रार्थना करने लगा। संत ने कहा पहले तुम दोनों भविष्य में ना लड़ने का संकल्प लो और प्रेम से रहना सीखो। मैं तभी यहाँ भोजन करूँगी। क्रोध में आकर गालियाँ देने वाले का भोजन मेरी भी बुद्धि भ्रष्ट कर देगा। यह सुन पति पत्नि दोनों ने उनके चरण स्पर्श कर क्रोध त्यागने की प्रतिज्ञा की, संत ने भी सहर्ष उनका भोजन स्वीकार किया।

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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