क्षितिज

शालिनी जैन, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

जहाँ  मिलती है अम्बर और धरती
वो क्षितिज कहलाता है
निराला सा है बंधन
भ्रम हो के भी सबको भाता है
 दिखता है दूर मगर
पर मुकम्मल सा नजर आता है
न होके भी दिखाई दे
ऐसा बंधन सबको भाता है
स्वार्थ के जहान में
यथार्थ का है दर्शन
काश रिश्तो में भी कड़वाहट न दिखाई दे
दूर होके भी प्यार की ध्वनि सुनाई दे
क्षितिज जैसा हो सुन्दर बंधन
जहाँ मिलती अम्बर और धरती
वो क्षितिज कहलाता है
निराला सा है बंधन
भ्रम हो के भी सबको भाता है

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