कण कण में भगवान

कुँवर आरपी स़िह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

        प्राचीन समय की बात है। एक राजा ने अपने राज्य में रहनेवाले उच्चकोटि के दर्शनशास्त्र के विद्वान को बुलाया और कहा-तीन प्रश्न मेरे लिए पहेली बने हुए हैं। ईश्वर कहाँ है, मैं उसे क्यों नहीं देख सकता, ईश्वर सारा दिन क्या काम करता है। यदि तुमने इनका सही जवाब नहीं दिया तो तुम्हारा सिर कटवा दिया जायेगा। विद्वान डर कर काँपने लगा, क्योंकि उन प्रश्नों का उत्तर उसे असम्भव लगा।
           वह राजा के सामने सम्मान और सहमति में सिर झुकाकर चला गया। उसने घर जाकर राजा के तीनों सवाल घरवालों को बताये। अगले दिन विद्वान का बेटा राजा के सामने हाजिर हुआ और बोला-क्षमा करें, क्या मुझे उन सवालों का जवाब देने की इजाजत है। राजा ने स्वीकृत दे दी। विद्वान के बेटे ने सेवकों से दूध का बड़ा कटोरा लाने को कहा। एक सेवक दूध भरा बड़ा कटोरा ले आया, फिर लड़के ने कहा कि कटोरे के दूध को मथा जाय, ताकि मक्खन अलग है सके। वो भी कर दिया गया। अब लड़के ने राजा से पूछा-महराज दूध मथने से पहले मक्खन कहाँ था। राजा बोला-दूध में। लड़के ने पूछा-किस हिस्से में। राजा ने कहा-पूरे दूध में। तब लड़के ने कहा कि इसी तरह ईश्वर भी हम सब में ही व्याप्त है। सभी वस्तुओं में। राजा ने कहा-फिर मैं ईश्वर को क्यों नहीं दे सकता। लड़के ने जवाब दिया-क्योंकी  आप सच्चे मनसे ईश्वर का ध्यान नहीं करते।
राजा बोला-अच्छा यह बताओ कि ईश्वर सारा दिन क्या करता है। लड़का बोला-महराज! इसका उत्तर देने के लिए हम दोनों को स्थान बदलना होगा। आप यहाँ आ जाय और मुझे राज सिंहासन पर बैठने दें। राजा ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। लड़के ने कहा-एक क्षण पहले आप यहाँ थे और मैं वहाँ। अब दोनों की अवस्थायें बदल गयी हैं। ईश्वर हमें ऐसेे ही उठाता और गिराता है। हमारे अपने कर्म इस के जिम्मेदार होते हैं। इन्सान को सदैव सबसे उच्चित व्यवहार करना चाहिये। लोभ, अहंकार और ईर्ष्या, इन्सान के अवनित के कारण होते हैं। उससे बचना ही श्रेष्कर होता है। राजा ने उस लड़के और विद्वान को यथोचित सम्मान देकर विदा किया।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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