अनुकम्पा

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

        मिश्र के प्रख्यात चिन्तक अनस्तेशियस के आश्रम में पुस्तकों का विशाल संग्रह था, जिनमें अनेक दुर्लभ, प्राचीन और मूल्यवान ग्रंथ थे। एक बार उनके आश्रम में आये एक व्यक्ति को एक ग्रन्थ बेहद महत्वपूर्ण लगा और उसने उसे चुपके से अपने वस्त्रों में छिपाकर ले गया। ग्रन्थ के गायब होने का पता अनस्तेशियस को तुरन्त हो गया। वह यह भी जान गये कि उसे कौन लेकर गया है, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।
        कुछ दिन बाद एक सम्पन्न व्यक्ति उनके पास वही ग्रन्थ लेकर आया। उसने बताया एक व्यक्ति इसे बेचने के लिए लाया था। वह इसे बेहद मूल्यवान बताकर इसकी मोटी कीमत माँग रहा है। अनस्तेशियस पुस्तक को फौरन पहचान गये, परन्तू वह इस बारे में चुप रहे और बोले-यह पुस्तक वाकई में अमूल्य है। आप इसे ऊँची कीमत में खरीद लें। वापिस लौटकर वह सम्पन्न व्यक्ति उसी किताब बेचने वाले के पास गया और किताब देने को कहा, वह बोला-मैंने इसके बारे में अस्तनेशियस से भी बात की है। यह सुनकर वह व्यक्ति दंग रह गया। उसने किताब उसी क्षण बेचने का इरादा छोड़ दिया। इसके बाद सीधा वह अनस्तेशियस के पास पहुँचा। उसकी आँखो में फश्चाताप के आँसू थे। वह बोला-आपने सब कुछ जानते हुए भी किसी को भनक तक नहीं लगने दी कि मैंने उसे चुराया है। आखिर क्यों?
अनस्तेशियस बोले-यदि मैं ऐसा करता तो तुम और झूठ बोलकर गलती करते। तुम इस पुस्तक को रख सकते हो, लेकिन भविष्य में कभी अपने ईमान और सच को तोलकर कोई गलत काम ना करना। यह अनुकम्पा भरी बात सुनकर वह व्यक्ति बोला-आपने क्षमा कर बहुत कृपा की है, इससे मेरी आँखे खुल गई हैं। अब इस किताब की मुझे कोई जरूरत नहीं है। मैं आपकी शरण और पुस्तकालय में रहकर जीवन सफल बनाना चाहता हूँ। उन्होंने उसे इजाजत दे दी।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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