सत्य की खोज़

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सिद्धार्थ जब पहली बार महल से बाहर निकले, तब उन्हें कुछ अद्भुत दृश्य दिखे। उन्होंने कुछ सवाल किए, परंतु उनकी जिज्ञासा का समाधान किसी ने नहीं किया। फिर एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि जब सवाल मैंने किए हैं तो जवाब भी हमारे अंदर ही होना चाहिए। अब खुद को बदलने की चुनौती उनके सामने थी। जब जिज्ञासा या स्वयं के प्रश्न चुनौती बनकर सामने खड़े हों तो उनका समाधान भी खुद ही करना होगा। यह निश्चय कर वह आगे बढ़े। अगर सवाल नये तरह के हैं, तो जवाब भी नयी तरह के होंगे।
उन्होंने चिंतन शुरू किया और उसे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती मानकर उसी के अनुरूप समाधान खोजना शुरू कर दिया। जब विचारों को बदलने की चुनौती हो, तो संकल्प व दृढ़ इच्छाशक्ति के बगैर उसका समाधान नहीं हो सकता। संकल्प के सामने विकल्प नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि विकल्प विचारों के किसी कोने में उपस्थित हो गया तो मन दोराहे पर खड़ा भटक जाएगा और छोटी चुनौती को भी नहीं जीता जा सकता। सिद्धार्थ इसलिए भगवान बुद्ध बने, क्योंकि उन्होंने विचारों को मौलिक समाधान की दिशा में देखा और आगे बढ़े जिंदगी में प्रगति के लिए विचारों का सकारात्मक दिशा में बढ़ना और बदलना जरूरी है।
नाटककार, विचारक और राजनीतिज्ञ बर्नाड शॉ के मुताबिक जो व्यक्ति अपना द़िमाग-विचार नहीं बदल सकते, वो कुछ नहीं बदल सकते। जैसे जीवन में कुछ ना करने की अपेक्षा कुछ कर्म करना भी अधिक उपयोगी और सम्मानजनक होता है, क्योंकि सफलता उसी को प्राप्त होती है, जो सोंचता और कर्म करता है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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