सच्चा धर्म

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

           आज विश्व ज्यादा शिक्षित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जिया जा रहा है, लेकिन अंधविश्वास और ढोंग-पाखण्ड आज भी सारी दुनिया का पीछा नहीं छोड़ रहा है। कम्प्यूटर, लेपटाप प्रयोग से पूर्व व्यक्ति उसे धूप अगरबत्ती दिखाकर उसका अभिवादन करता है। किसी को अपनी दाढ़ी में सच्चा धर्म नज़र आता है तो किसी को अपनी चोटी-टोपी पर गर्व है। उन्हें लगता है कि सारे संसार की तरक्की और सुरक्षा उनकी दाढ़ी और चोटी के कारण है। धार्मिक पहचान के लिए धारण किये गए निशान बाद में  कट्टरता और श्रेष्ठता के प्रतीक बन गए, लेकिन मातृभूमि रक्षा को ही अपना सर्वोपरि धर्म मानने वाले कम्बोज वीर शहीद ऊधम सिंह ने इन सब प्रतीकों से ऊपर उठकर अपने पासपोर्ट पर नाम में कई धर्मों के सम्बोधन शब्द इस्तेमाल किये थे।
ऐसा ही उदाहरण महानक्रांतिकारी और देश भक्त शहीद भगत सिंह ने भी  पेश किया था। भगत सिंह लाहौर की बोर्स्टल जेल में फाँसी का इन्तजार कर रहे थे। उसी जेल में एक वृद्ध स्वतंत्रता सेनानी भी थे, उन्होंने भगत सिंह से यह कह कर मिलने से इन्कार कर दिया, क्योंकि उन्होंने अपने केश कटवाकर सिख धर्म की तौहीन की है। भगत सिंह ने उन वृद्ध स्वतंत्रता सेनानी को जवाब भेजा कि मैं अपने देश पर अपने अंग अंग भी कुर्बान कर सकता हूँ, फिर केश की क्या बात। उनका यह जवाब और देश प्रेम जज्ब़ा बूढ़े स्वतंत्रता सेनानी को रुला गया। उम्र के आखिरी पडा़व में एक युवक ने धर्म का असली मर्म उन्हें समझा दिया था।
     भगत सिंह और वृद्ध स्वतंत्रता सेनानी धर्म के दो अलग किनारों पर खड़े थे। हम हर दौर में इन दो किनारों, विचारधाराओं का टकराव हम देखते हैं। कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम की गोली का नाम दिया था, लेकिन असली मायने में धर्म तो वही श्रेष्ठ होता है, जिसमें अहम नहीं ,बल्कि मानवता की रक्षा और भलाई ज्यादा हो। उच्च -धर्म दयालुता और साहस भरा होता है, जो अपनी और शरणागत तथा मातृभूमि की रक्षा कर सके।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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