सत्य और दयाभावना

कुँवर आर.पी.सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र। 

भगवान बुद्ध एक बार मगध के एक गाँव पहुँचे। गाँव का मुखिया बुद्ध से बहुत कुपित था। वह सदा दुर्व्यसनों में लिप्त रहता था और देवी देवताओं को प्रसन्न करने के नाम पर मूक निरीह पशुओं की बलि देता था। बुद्ध ने लोगों के सम्मुख जब अपने उपदेश में हिंसा और दुर्व्यसनों का विरोध और परित्याग करने को कहा तो गाँव का मुखिया आगबबूला हो गया और उसने गाँव वालों से उन्हें न सुनने और भिक्षा न देनें को कहा। बुद्ध को इसकी जानकारी मिली तो वह भिक्षा माँगने मुखिया के घर ही जा पहुँचे। पहले से ही जला भुना बैठा मुखिया उनको देखते ही बोला-भीख माँगते हुए लज्जा नहीं आती? धर्म के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाते हो।
बुद्ध ने मुस्कराते हुए कहा-वत्स! हम दुर्गुण छोड़कर, सद्गगुण ग्रहण करने का उपदेश देते हैं। दुर्व्यसन, अहंकार, घृणा त्यागकर सत्कर्म की प्रेरणा देते हैं, जिससे जीवन सुखी, सफल होता है, लेकिन मुखिया ने चिल्लाकर कहा-भिखमंगे! मैं इस गाँव का मालिक हूँ। यहाँ से तुरन्त निकल जाओ। महात्मा बुद्ध ने विचलित हुए बगैर धैर्य से कहा-मैं तुम्हारे पास भिक्षा माँगने आया था। तुमने भिक्षा देने के बजाय मुझे गालियाँ दीं। मैं इन गालियों को स्वीकार नहीं करता, इन्हें तुम अपने पास रखो। कहकर वह मुड़कर चल पड़े, लेकिन बुद्ध के सरल शब्दों और व्यवहार ने मुखिया के हृदय को झंकझोर दिया। वह आत्मग्लानि में आगे बढ़ा और भगवान बुद्ध के चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगा।
बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उसे उठाकर सीने लगाते हुए उपदेश देते हुए कहा-निरीह पशुओं की हत्या और निर्बल मानवों पर अत्याचार घोर पाप है। अहंकार और मांस मदिरा से बुद्धि भ्रष्ट होती है। सत्य का पालन और दया भावना ही कल्याणकारक है। उसी का पालन कर जीवन सरल, सुखी बनाओ। दूसरों के भी सुख का ध्यान, कामना करो।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ 

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