शिवपुराण से……. (271) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

यज्ञदत्त-कुमार को भगवान् शिव की कृपा से कुबेरपद की प्राप्ति तथा उनकी भगवान् शिव के साथ मैत्री

गतांक से आगे……..

पिता ने अपने पुत्र को त्याग दिया। वह घर से निकल गया और कई दिनों तक भूखा भटकता रहा। एक दिन वह नेवैद्य चुराने की इच्छा से एक शिव मन्दिर में गया। वहां उसने अपने वस्त्र को जलाकर उजाला किया। यह मानों उसके द्वारा भगवान् शिव के लिए दीपदान किया गया। तत्पश्चात वह चोरी में पकड़ा गया और उसे प्राणदण्ड़ मिला। अपने कुकर्मों के कारण वह यमदूतों द्वारा बांधा गया। इतने में ही भगवान् शंकर के पार्षद वहां आ पहुुंचे और उन्होंने उसे उनके बंधन से छुड़ा दिया। शिवगणों के संग से उसका हृदय शुद्ध हो गया।

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अतः वह उन्हीं के साथ तत्काल शिवलोक में चला गया। वहां सारे दिव्य भोगों का उपयोग तथा उमा-महेश्वर का सेवन करके कालान्तर में वह कलिंगराज अरिंदम का पुत्र हुआ। वहां उसका नाम था दम। वह निरन्तर भगवान् शिव की सेवा में लगा रहता था। बालक होने पर भी वह दूसरे बालकों के साथ शिव का भजन किया करता था। वह क्रमशः युवावस्था को प्राप्त हुआ और पिता के परलोकगमन के पश्चात् राजसिंहासन पर बैठा। राज दम बड़ी प्रसन्नता के साथ सब ओर शिवधर्मों का प्रचार करने लगे। भूपाल दम का दमन करना दूसरों के लिए सर्वथा कठिन था। बह्मन्! समस्त शिवालयों में दीपदान करने के अतिरिक्त वे दूसरे किसी धर्म को नहीं जानते थे। उन्होंने अपने राज्य में रहने वाले समस्त ग्रामध्यक्षों को बुलाकर यह आज्ञा दे दी कि शिव मन्दिर में दीपदान करना सबके लिए अनिवार्य होगा।

(शेष आगामी अंक में)

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