मेमोरियलः मनोज भाटिया ने छोटी से उम्र जो कमाया, वह बड़े-बड़ों को भी नसीब नहीं होता


शि.वा.ब्यूरो, खतौली। हजारो साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। ये पंक्तियां हजारों आंखों का नम करके परमधाम को जाने वाले युवा व्यवसायी, पत्रकार और समाजसेवी मनोज भाटिया पर इस तरह फीट बैठती हैं, मानों ये लाईन उन्हीं के लिए लिखी गयी हों। स्थानीय हवेली बैंकटहाॅल में आयोजित उठाला कार्यक्रम में उमड़े जन सैलाब ने श्री भाटिया के जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर दिया था। वहां मौजूद ऐसी कोई आंख नहीं थी, जो मनोज भाटिया के जाने के गम में नम न हो।
हजारों परिवारों के चहेते मनोज भाटिया ने छोटी से उम्र जो कमाया, वह बड़े-बड़ों को भी नसीब नहीं होता है। पंजाबी समाज में ही नहीं, बल्कि नगर के किसी भी आदमी को परेशानी महसूस होती थी, तो परेशानी से निजात पाने के लिए उसके जहन में एक ही नाम उभरता था और वो था, मनोज भाटिया। कालेज के समय के उनके एक साथी सुशील पुण्ड़ीर का कहना है कि यदि मनोज पर कोई लिखना चाहे तो एक ग्रन्थ तैयार हो सकता है। निकटवर्ती ग्राम सठेड़ी निवासी पत्रकार डा.रविन्द्र सिंह अक्सर कहते हैं कि मनोज की बदौलत उनकी जिन्दगी में सकारात्मक बदलाव आना आरम्भ हुआ था, लेकिन ईश्वर ने जल्द ही उन्हें अपने पास बुला लिया। रविन्द्र सिंह कहते हैं कि आज ऐसे लोग कम हैं, जो अपनों साथ-साथ, जिनसे कोई मतलब-वास्ता भी न हों, ऐसे लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हों।

वर्ष 2020 के बारे ज्यातिषों की वह भविष्य सही साबित हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि देखें वर्ष 2020 किस-किसका क्या-क्या लेकर जायेगा। साल 2020 हरदिल अजीज, वो हमेशा मुस्कराता हुआ चेहरा, जो दूसरों के चेहरों पर वैसी ही मुस्कराहट लाने का प्रयास करने वाला सकारात्मक सोच के व्यक्तित्व के स्वामी को अपने साथ ही ले गया। सैकड़ों परिवारों की दीवाली की खुशी, बड़े दिन का सैंटाक्लाॅज, नये साल, लोहड़ी, होली की मस्ती थे, मनोज भाटिया।

https://shikshavahini.com/2803/

ज्ञात हो कि बहु प्रतिभा के धनी मनोज भाटिया का बीती 12 नवम्बर को फेफडों में हुए संक्रमण का उपचार के दौरान सुभारती मेडिकल कालेज मेरठ में निधन हो गया था। नका अन्तिम संस्कार हरिद्वार के कनखल स्थित दक्ष मन्दिर के समीप शमशान घाट में किया गया था। उनके निधन की सूचना से हर व्यक्ति स्तब्ध रह गया था। कहते हैं कि जब कोई जीव इस जगत् में आता है, तभी उसके जाने का समय भी तय हो जाता है और लोग समय के इस चक्र के आगे बेबस इस जहां से चले जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो व्यक्तित्व व कृतित्व के कारण समाज में ऐसा मुकाम हासिल कर लेते हैं, जिन्हें जमाना बरसो-बरस याद करता रहता है। ऐसी ही शख्शियत थे मनोज भाटिया।

Related posts

Leave a Comment