मानवचरित्र

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सन्यासी बनकर गौतम बुद्ध ने आत्मा और परमात्मा जैसे निर्रथक बातों विषयों में फँसने की बजाय सामाजिक व संसारिक बुराईयों कुरीतियों को मिटाने पर ज्यादा समय और समाज सुधार पर ध्यान केन्द्रित किया। तथागत ने भिक्क्षुक बनकर सबसे पहले स्वयं को दूसरों से लघु स्थापित किया, ताकि मन कदापि अहंकार बचा न रहे। वह हमेशा अनेकानेक जगहों का भ्रमण करते रहते। एक बार वह गाँव के बाहर बाग में विश्राम हेतु ठहरे हुए थे, वहाँ उनके पास एक स्त्री उनसे मिलने आई और बोली-आप तो कि सी राज्य के राजकुमार लगते हैं। क्या ये जान सकती हूँ कि इस युवावस्था में ये गेरुआ वस्त्र धारण किये?
 बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि तीन प्रश्नौं का हल ढूँढ़ने के लिये उन्होंने सन्यास लिया है। यह शरीर जो युवा और आकर्षक है, जल्द ही वृद्ध होगा और समाप्त होगा। मुझे वृद्धावस्था, बीमारी और मृत्यु के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है। यह जानकर वह स्त्री बुद्ध से और भी प्रभावित हुई और उसने उन्हें अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया। शीघ्र ही ये बात पूरे गाँव में फैल गई। जगह-जगह इसकी चर्चा होने लगी। सबने एकमत यह निर्णय लिया कि बुद्ध के पास चलकर उन्हें उस स्त्री का न्यौता अस्वीकार करने को राजी़ किया जाय।
 गाँववासी बुद्ध के पास आये और उनसे आग्रह किया कि वह उस स्त्री के घर भोजन करने ना जाय, क्योंकि वह चरित्रहीन है। भीड़ में गाँव के मुखिया से बुद्ध ने पूछा-क्या आप भी मानते हैं कि वह एक चरित्रहीन स्त्री है? मुखिया बोला-मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि वह एक चरित्रहीन स्त्री है। अतः आप उसके घर न जांय। बुद्ध ने मुखिया का दायाँ हाथ पकड़ा और उसे ताली बजाने को कहा। हैरत से मुखिया बोला-एक हाथ से ताली मैं क्या, कोई नहीं बजा सकता। बुद्ध ने विनम्रता से कहा-इसी प्रकार वह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है?  जब तक इस गाँव के पुरुष चरित्रहीन न हों? अगर गाँव के सारे पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती, इसलिये क्या आप सब लोग इसके जिम्मेदार नहीं हैं? यह सुनकर सब लोग लज्जित हो गये और तथागत से क्षमा माँगी।
आज भी ऐसा ही हो रहा है, स्वयं चोर दूसरे को चोर साबित करने में लगा हुआ है। अपने स्वार्थ के लिए दूसरे को पथभ्रष्ट किया जा रहा है अथवा दूसरों के साफ दामन भी दागी बनाने का प्रयास हो रहा है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ 

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