शिवपुराण से……. (270) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की, ऋषियों की तथा दक्ष कन्याओं की संतानों का वर्णन तथा सती और शिव की महत्ता का प्रतिपादन

गतांक से आगे……..

मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने सृष्टिक्रम का तुमसे वर्णन किया है। ब्रह्माण्ड़ का यह सारा भाग भगवान् शिव की आज्ञा से मेरे द्वारा रचा गया है। भगवान् शिव को परब्रह्म परमात्मा कहा गया है। मैं, विष्णु तथा रूद्र-ये मनोरम शिवलोक में शिवा के साथ स्वच्छन्द विहार करते हैं। भगवान् शिव स्वतंत्र परमात्मा हैं। निर्गुण और सगुण भी वे ही हैं।            (अध्याय 16)

यज्ञदत्त-कुमार को भगवान् शिव की कृपा से कुबेरपद की प्राप्ति तथा उनकी भगवान् शिव के साथ मैत्री

सूतजी कहते हैं- मुनीश्वरों! ब्रह्माजी की यह बात सुनकर नारदजी ने विनयपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और पुनः पूछा-भगवन्! भक्तवत्सल भगवान् शंकर कैलास पर्वत पर कब गये और महात्मा कुबेर के साथ उनकी मैत्री कब हुई? परिपूर्ण मंगल विग्रह महादेव जी ने वहां क्या किया? यह सब मुझे बताइये। इसे सुनने के लिए मेरे मन में बड़ा कौतूहल है।
ब्रह्माजी ने कहा- नारद! सुनो, चन्द्रमौलि भगवान् शंकर के चरित्र का वर्णन करता हूं। वे कैसे कैलास पर्वत पर गये और कुबेर की उनके साथ किस प्रकार मैत्री हुई, यह सब सुनाता हूं।काम्पिल्य नगर में यज्ञदत्त नाम से प्रसि( एक ब्राह्मण रहते थे, जो बड़े सदाचारी थे। उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम गुणनिधि था। वह बड़ा ही दुराचारी और जुआरी हो गया था।

(शेष आगामी अंक में)

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