शिवपुराण से……. (269) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की, ऋषियों की तथा दक्ष कन्याओं की संतानों का वर्णन तथा सती और शिव की महत्ता का प्रतिपादन

गतांक से आगे……..

उनमें से श्रद्धा आदि तेरह कन्याओं का विवाह दक्ष ने धर्म के साथ कर दिया। मुनीश्वर! धर्म की उन पत्नियों के नाम सुनों-श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वसु, शान्ति, सिद्धि और कीर्ति-ये सब तेरह हैं। इनसे छोटी जो शेष ग्यारह सुलोचना कन्याएं थी, उनके नाम इस प्रकार हैं-ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, संनति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा तथा स्वधा। भृगु, शिव, मरीचि, अंगिरा मुनि, पुलस्त्य, पुलह, मुनिश्रेष्ठ क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ, अग्नि और पितरों ने क्रमशः इन ख्याति आदि कन्याओं का पाणिग्रहण किया। भृगु आदि मुनिश्रेष्ठ साधक हैं। इनकी संतानों से चराचर प्राणियों सहित सारी त्रिलोकी भरी हुई है।
इस प्रकार अम्बिकापति महादेव जी की आज्ञा से अपने पूर्वकर्मों के अनुसार बहुत से प्राणि असंख्य श्रेष्ठ द्विजों के रूप में उत्पन्न हुए। कल्पभेद से दक्ष के साठ कन्याएं बतायी गयी हैं। उनमें से दस कन्याओं का विवाह उन्होंने धर्म के साथ किया। सत्ताईस कन्याएं चन्द्रमों को ब्याह दीं और विधिपूर्वक तेरह कन्याओं के हाथ दक्ष ने कश्यप के हाथ में दे दिये। नारद! उन्होंने चार कन्याएं श्रेष्ठ रूप वाले ताक्ष्र्य (अरिष्टनेमि) को ब्याह दीं तथा भृगु, अंगिरा और कृशाश्व को दो-दो कन्याएं अर्पित की। उन स्त्रियों से उनके पतियों द्वारा बहुसंख्यक चराचर प्राणियों की उत्पत्ति हुई। मुनिश्रेष्ठ! दक्ष ने महात्मा कश्यप को जिन तेरह कन्याओं का विधिपूर्वक दान दिया था, उनकी संतानों से सारी त्रिलोकी व्याप्त है। स्थावर और जंगम कोई भी सृष्टि ऐसी नहीं है, जो कश्यप की संतानों से शून्य हो।

(शेष आगामी अंक में)

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