शिवपुराण से……. (269) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की, ऋषियों की तथा दक्ष कन्याओं की संतानों का वर्णन तथा सती और शिव की महत्ता का प्रतिपादन

गतांक से आगे……..

देवता, ऋषि, दैत्य, वृक्ष, पक्षी, पर्वत तथा तृण-लता आदि सभी कश्यप पत्नियों से पैदा हुए हैं। इस प्रकार दक्ष कन्याओं की संतानों से सारा चराचर जगत् व्याप्त है। पाताल से लेकर सत्यलोक पर्यन्त समस्त ब्रह्माण्ड़ निश्चय ही उनकी संतानों से सदा भरा रहता है, कभी खाली नहीं होता।
इस तरह भगवान् शंकर की आज्ञा से ब्रह्माजी ने भलीभांति सृष्टि की। पूर्वकाल में सर्वव्यापी शम्भु ने जिन्हें तपस्या के लिए प्रकट किया था तथा रूद्रदेव ने त्रिशूल के अग्रभाग पर रखकर जिनकी सदा रक्षा की है, वे ही सती देवी लोकहित का कार्य सम्पादित करने के लिए दक्ष से प्रकट हुई थीं। उन्होंने भक्तों के उद्धार के लिए अनेक लीलाएं की। इस प्रकार देवी शिवा ही सती होकर भगवान् शंकर से ब्याही गयीं, किन्तु पिता के यज्ञ में पति का अपमान देख उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया और फिर उसे ग्रहण नहीं किया। वे अपने परमपद को प्राप्त हो गयीं। फिर देवताओं की प्रार्थना से वे ही शिवा पार्वती के रूप में प्रकट हुई और बड़ी भारी तपस्या करके पुनः भगवान् शिव को उन्होंने प्राप्त कर लिया। मुनीश्वर! इस जगत् में उनके अनेक नाम प्रसिद्ध हुए। उनके कलिका, चण्डिका, भद्रा, चामुण्डा, विजया, जया, जयंती, भद्रकाली, दुर्गा, भगवती, कामाख्या, कामदा, अम्बा, मृडानी और सर्वमंगला आदि अनेक नाम हैं, जो भोग और मोक्ष देने वाले हैं। ये सभी नाम उनके गुण और कर्मों के अनुसार हैं।

(शेष आगामी अंक में)

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