पुरोहित के मुक्तक

डॉ. राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

खुली किताब सी है मेरी जिन्दगी
उन्मुक्त उड़ान सी है मेरी जिन्दगी
यूँ ही गुजरती है देखो जिन्दगी
कभी हँसी तो कभी गम में है जिन्दगी

बेटियों को बचाने का जतन कीजिए
जो कर रहे दरिन्दगी उनको सजा दीजिए
वक़्त नहीं सोचने का रहा अभी दोस्तों
वक़्त रहते दोषियों को सजा दीजिए

सादगी देख कर मेरी,वो कायल हो गए।
समझो प्रेम में मेरे,वो घायल हो गए।।
बात इतनी सी थी मगर, कैसे कहें दिल से।
ढाई आखर प्यार में,वो पागल हो गए।।

ढाई आखर में छिपा, जीवन का सब राज।
जिस जिस ने इसको पढ़ा, सफल हुए सब काज।।
इसीलिए करते रहो, सरल जगत में काम।
फिर देखो कैसे बजे, दिल में सारे साज।।

काम क्रोध वश में करें, मन को रोके रोज।
ऐसे ही करते रहें, जीवन में नित खोज।।
भीतर ही सबको मिला,जीवन में रस होय।
करनी ऐसी कर चलो, सोच सके तो सोच।।

सागर से गहरी रही, ममता की ये छाँव।
सदा लाड़ दुलार करे, खोजती रहती ठाँव।।
मेहनत करती ये सदा, छाले पड़ते पाँव।
ममता का सुख है यही, देखो जाकर गाँव।।

कवि, साहित्यकार श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी, जिला-झालावाड़, राजस्थान

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