अन्धविश्वास

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिन्दुस्तान में सदियों से समय-समय पर भगवान बुद्ध, महावीर जैसे तमाम सिद्ध ,संत ,ज्ञानी और युगदृष्टा,अध्यात्मिक श्रेष्ठजन हुए। फिर क्या वजह है कि अन्य देशों में जहाँ एक-दो या तीन-चार ही तारनहार हुए, लेकिन इस देश की भूख, गरीबी कोई मिटा न सका, और न कोई भाग्य को बदल सका। आज कम्प्यूटर टेक्नोलोजी में पूरी दुनिया में भारतीय बुद्धि का कोई सानी नहीं है, लेकिन यह बुद्धि भी उन्हें कम्प्यूटर की पूजा करने से नहीं रोंकती। अंधविश्वास आज भी पढ़े-लिखे लोगों तक में और गहरी पैठ बना चुका है।
     ओशो ने इसका साफ साफ उत्तर दिया है कि बाहर की गरीबी और भीतर की गरीबी, ये दो भिन्न चीजें हैं। आप कितने ही अध्यात्मिक  हों, ध्यान करने से आपको भोजन नही मिलेगा। उसके लिये अन्न या धन कमाना ही होगा। ठीक उसी तरह आपके पास कितना ही धन क्यों न हो, उससे आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी। शान्ति के लिए ध्यान करना होगा। इन दोनों बातों का स्पष्ट विभाजन भी समझना भी उचित होगा।
        सदियों से हम इस भूल में जी रहे हैं कि पूजा-अर्चना से भौतिक समृद्धि मिलेगी। यही भूल मानव प्रगति में बाधक हो गई है, क्योंकि पेट के अपने नियम हैं और आत्मा के अपने नियम हैं। जैसे आँखों का काम देखना है और कानों का सुनना। अतः जो कानों से देखने की कोशिश करेगा, वह मूर्ख है और जो आँख से सुनने की कोशिश करेगा, वह भी मूूर्ख कहलायेगा।
     जीवन के कुछ गणित हैं, उन्हें सुलझाने के लिए समझदारी, बुद्धिमानी चाहिये। लोग कितना भी ध्यान करें, उनका मन तो अब भी संसार में उलझा हुआ है। छोटी-छोटी इच्छायें भी उनके जीवन का केन्द्र बिन्दु होती हैं। उन्हें पूरी करने के लिए श्रम की बजाय, वे मन्दिर पहुँच जाते हैं। यही गलती और अंधविश्वास है, जबकि ध्यान से जो सजगता आती है। उसका उपयोग वे धन कमाने के लिए करें और धन से जो सुविधायें मिलती हैं, उनके सहारे वे चिन्ता से ऊपर उठकर बेफिक्र होकरध्यान में डूब जांयें।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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