कर्मठता

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

स्कूल की ओर से बच्चों को रिजर्व वाईल्ड लाइफ नेशनल पार्क में घूमने का अवसर मिला, इससे बच्चे बहुत उत्साहित थे। मास्टर जी भी उनके साथ थे, जो उन्हें बीच बीच में जंगल, जानवरों और उनके विषय में जानकारियाँ दे रहे थे।  वे धीरे-धीरे देखते हुए आगे बढ़ रहे थे, तभी गाइड ने सभी को शान्त होने का इशारा करते हुए कहा-सब लोग बिल्कुल चुपचाप होकर उस तरफ देखिये, एक मादा जिर्राफ बच्चे को जन्म दे रही थी। मादा जिर्राफ बहुत ऊँची थी, इसलिये जन्म लेता बच्चा करीब दस फुट ऊँचाई से नीचे गिरा और गिरते ही अपने पाँव अन्दर की ओर मोड़ लिये। इसके बाद माँ जिर्राफ ने सिर झुकाया और बच्चे को देखने लगी। सभी लोग बड़ी उत्सुकता से यह सब होते देख रहे थे कि अचानक कुछ अप्रत्यासित सा घटा।
     माँ ने जोर से बच्चे को लात मारी और बच्चा अपनी जगह पलट गया। एक बार फिर माँ ने उसे दूसरी और से जोर से लात मारी, इस बार बच्चा लड़खड़ाता हुआ उठकर खड़ा हो गया और धीरे-धीरे डगमगाते हुये माँ के साथ झाड़ियों में ओझल हो गया। उनके जाते ही बच्चों ने मास्टर जी से पूछा-सर! वह जिर्राफ अपने ही बच्चे को लात क्यों मार रही थी ? मास्टर जी ने बताया-बच्चों जंगल में शेर, चीते जैसे तमाम खूँखार जानवर होते हैं। यहाँ ऐसे बच्चों का जीवन इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितनी जल्दी अपने पैरों पर चलना सीखते हैं। अगर उसकी माँ उसको इसी तरह पड़े रहने देती, उसके लात न मारती तो शायद वह वहीं पडा़ रहता और कोई जंगली जानवर उसे अपना शिकार बना लेता।
 बच्चों! ठीक इसी तरह कभी-कभी तुम्हारे माँ-बाप भी आपको डाँटते डपटते हैं। उस वक्त तो यह सब तुम्हें बहुत बुरा लगता है, परन्तु जब आप बाद में पीछे मुड़कर देखते हैं तो कहीं न कहीं आपको यह एहसास होता है कि माँ-बाप की डाँट-डपट की वजह से ही आज आप लाइफ में कुछ बन पाये हैं। इसलिये अपने बड़ों की डाँट, सख्ती को कभी दिल पर न लें।  इन्सान हो या जानवर, योग्य और कर्मठ बनाने के लिये सीख देते समय ऐसा करना जरूरी भी हो जाता है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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