जनगणना का बहिष्कार क्यों न करे ओबीसी समाज

ललित कुमार, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

          चिंतन कीजिए कि जब शासन द्वारा प्रत्येक 10 वर्ष में भारत के नागरिकों में से अन्य सभी समाजों की गणना की तो की जाती है, किंतु ओबीसी समाज को गणना से वंचित कर रखा जाता है। ओबीसी समाज की जानबूझकर गणना नहीं की जाती है, ऐसा क्यों ? क्या हम भारत के नागरिक नहीं हैं ? क्या इसके पीछे कोई साजिश तो नहीं हैं ? आइए इस पर विचार करें-
1.इसके पीछे वर्ग विशेष की सोची समझी रणनीति है। यदि ओबीसी समाज की गणना की जाती है और उसके आंकड़े प्रकाशित किए गए तो ओबीसी समाज को ज्ञात हो जायेगा कि भारत में हमारी कितने प्रतिशत जनसंख्या है और ओबीसी समाज जनसंख्या के अनुपात में प्रत्येक क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी मांगने लगेगा। जैसा कि संविधान में उल्लेखित है कि जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी।
2. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम देख रहे हैं कि लोकतंत्र के चार स्तंभ व्यवस्थापिका, कार्यपालिका,  न्यायपालिका व  मीडिया लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी कहलाते हैं। इन चारों में ओबीसी की भागीदारी लगभग शून्य हैं।
3. जब कभी ओबीसी समाज संविधान में उल्लेखित अधिकार और हिस्सेदारी की शासन से मांग करता है अथवा अपने हक के लिए न्यायालय की शरण में जाता है और अपने तर्क रखता है तो न्यायालय शासन से जवाब तलब करती है कि ओबीसी समाज के आंकड़े प्रस्तुत किए जाएं, लेकिन जनगणना नहीं होने के कारण शासन आंकड़े प्रस्तुत नहीं कर पाती। परिणाम स्वरूप हमें न्यायालय से न्याय नहीं मिल पाता और हमारे संवैधानिक हक से हम वंचित रह जाते हैं, क्योंकि शासन और न्यायालय में वर्ग विशेष के ही नुमाइंदे बैठे हुए हैं, जो कभी नहीं चाहते की ओबीसी समाज को उनका हक अधिकार मिलें। ओबीसी फुटबॉल की तरह कभी इधर, तो कभी उधर नाचते फिरते हैं। कारण यह है कि ओबीसी संगठित नहीं हैं। जिस दिन ओबीसी संगठित हो गए तो शासन को घुटने टेकने पड़ेंगे और विधानसभा से लेकर लोकसभा और राज्यसभा में ओबीसी समाज के लोग चुनकर जाएंगे और प्रत्येक राज्य एवं केंद्र में ओबीसी की ही सरकार बनेगी।
4. ओबीसी समाज की गणना होने से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू होगी और पढ़े-लिखे ओबीसी को प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ने के रास्ते अख्तियार हो जाएंगे। फिर वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं रहेगा, वरन जनसंख्या के अनुपात में संविधान संगत यह हो जाएगा कि वोट हमारा राज भी हमारा रहेगा।
5. ओबीसी समाज की जनगणना होने से शासन के पास ओबीसी समाज के अधिकृत आंकड़े आ जावेंगे और सरकार ओबीसी के हक अधिकार के साथ किसी भी प्रकार की खिलवाड़ नहीं कर पायेगी। सरकार को ओबीसी की बात को मानने के लिए बाघ्य होना पड़ेगा।
6. प्रथक से ओबीसी की जनगणना होने से जनसंख्या के अनुपात में जिस तरह SC  समाज को जो 15% पूरे भारत में है, उन्हें उनकी आबादी के अनुसार राजनीतिक एवं शासकीय विभागों में आरक्षण का लाभ मिल रहा है, ठीक इसी प्रकार ST समाज को जो भारत में 7.5% पर्सेंट है, उन्हें भी संविधान के अनुरूप आजादी के तुरंत बाद से जनसंख्या के अनुपात पर 7.5%  राजनैतिक एवं शासकीय योजनाओं का लाभ मिल रहा है। यदि ओबीसी की जनगणना हो जाए तो ओबीसी को भी लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद एवं जिला स्तर पर  शासकीय योजना व नौकरियों में उसे भी आरक्षण का लाभ जनसंख्या के अनुसार मिलने लगेगा। वर्तमान में लगभग ओबीसी समाज भारत की संपूर्ण आबादी का आबादी लगभग 65% है, किंतु वास्तविक लाभ 4% ही मिल रहा है। यह बहुत बड़ा षड्यंत्र एवं धोखा है। ओबीसी समाज की प्रथम जनगणना 1931 में अंग्रेज सरकार के समय की गई, जिसमें लगभग 52% ओबीसी की आबादी थी, तब से लेकर आज पर्यंत तक ओबीसी समाज को जनगणना से एक सोची समझी राजनीति, रणनीति, षड्यंत्र के तहत वंचित रखा जा रहा है। आजादी के बाद 1951 एवं 1961 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जनगणना के लिए मना किया। दूसरा 1971 एवं 1981 में इंदिरा गांधी जी ने जनगणना के लिए मना किया। 1991 में पीवी नरसिम्हा राव ने जनगणना के लिए मना किया। 2001 में पंडित अटल बिहारी वाजपेई ने मना किया। 2011 में प्रणब मुखर्जी तत्कालीन राष्ट्रपति ने मना किया। सभी ने  ब्राह्मणवादी मानसिकता के कारण ओबीसी की जनगणना नहीं होने दी। वर्तमान में मोदी सरकार द्वारा भी इसे भी रोका जा रहा है। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की गई। कुछ ब्राह्मणवादी वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में रिट लगवा दी, जिससे सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा 50% से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता, यह कहकर 27% आरक्षण का लाभ देने की बात सुप्रीम कोर्ट ने कही और लागू करने के लिए प्रदेश सरकारों को दिशा-निर्देश जारी किया।
हाल ही में मध्यप्रदेश में 27% आरक्षण की घोषणा की गई, यहां भी मनुवादी विचारधारा के लोगों के पेट में तकलीफ हुई और उन्होंने 11 याचिकाएं हाईकोर्ट में लगाकर ओबीसी को 27% आरक्षण के लाभ से वंचित रखा जा रहा है, जो अभी तक पेंडिंग है। वर्तमान में कहने को तो ओबीसी को 14% आरक्षण दिया जा रहा है, जबकि इसमें भी क्रीमीलेयर लागू होने से वास्तविक रूप से 4% ही आरक्षण मिल रहा है। अब जबकि 9 फरवरी 2021 से जनगणना होनी है और उसमें भी ओबीसी को जनगणना से वंचित रखा जा रहा है।
आईये! हम सब मिलकर अपने हक अधिकार के लिए बच्चों के भविष्य के लिए 9 फरवरी 2021 से होने वाली जनगणना का बहिष्कार कर विरोध दर्ज कराएं।  इस आशय का ज्ञापन भारत सरकार को पूर्व में ही सौंपा जा चुका है।
अतः जब सरकारी कर्मचारी जनगणना करने आपके पास आए तो उससे पूछा जाए कि क्या इस जनगणना पत्रक में ओबीसी का कालम है? यदि वह उत्तर नहीं में देता है तो उसको विनम्रता पूर्वक बोलना है कि पत्रक में ओबीसी का कालम नहीं होने के कारण हम जनगणना में भाग नहीं ले रहे हैं। हम इस जनगणना का बहिष्कार करते हैं। सभी परिवार अपने अपने दरवाजे पर एक स्टीकर लगाएं, जिसमें लिखा हो कि ओबीसी का कालम नहीं तो जनगणना मैं सहभाग नहीं। लोकतंत्र का अर्थ है कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।
राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय ओबीसी महासभा व ओबीसी एससी एसटी संयुक्त मोर्चा

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