उपासना

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

कुरु प्रदेश का राजकुमार श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त था, वह राज्य और तमाम सांसारिक सुखों को त्यागकर वृन्दावन जाकर भगवान श्रीकृष्ण की उपासना में लीन हो गया। एक बार मगध देश के राजा तीर्थयात्रा करते हुए वृन्दावन पहुँचे। वटवृक्ष के नीचे युवक को समाधि में देखकर वह युवक की समाधि खुलने की प्रतीक्षा करने लगे। समाधि टूटी तो राजा ने युवक से बात प्रारम्भ की। उन्होंने कहा-तुम्हारे चेहरे का तेज और भावभंगिमा देखकर लगता है कि तुम किसी उच्च परिवार से हो ?
 युवक ने कहा- राजन! भगवान की इस कर्मभूमि में न कोई राजकुमार होता है और न कोई राजा। राजा के कोई सन्तान नहीं थी।  उन्होंने युवक से आग्रह किया कि वह उनके साथ मगध चले। यहाँ अभाव का जीवन बिताने के बजाय गृहस्थ का जीवन ज्यादा श्रेष्ठ है। युवक ने होंठों पर मुस्कान बिखेरते हुए पूछा-राजन! क्या गृहस्थ का जीवन सदा सुखी रहता है, उसे दुःख नहीं भोगने पड़ते? राजा ने कहा-प्रारब्ध के अनुसार दुःख भी भोगना पड़ता है, सदा सुखी रहे, ऐसा भी नहीं है। तब युवक ने कहा-राजन! मैं तमाम सांसारिक सुख सुविधाओं से ऊबकर ही ईश्वर की भक्ति करने यहाँ आया हूँ। यहाँ मुझे कृष्ण-भक्ति में अनन्य सुख की अनुभूति हो रही है। कृपया मुझे इस अनूठे उपासना-आनन्द से वंचित न करें।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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