सुकेत के बहुप्रसिद्ध लोकगीत लाड़ी सरजू में निहित है रियासती काल का इतिहास, सरजू गीत की शूटिंग भी पूरी

डाक्टर हिमेन्द्रबाली’हिम”/ डाक्टर जगदीश शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला में पांगणा एक ऐतिहासिक गांव है। सुकेत क्षेत्र का लोकप्रिय लोकगीत लाड़ी सरजू में यहां की तात्कालिक सामाजिक व राजसी व्यवस्था का जीवंत वर्णन सन्निहित है। लोक परम्परा के अनुसार सरजू सुकेत रियासत के राजदरवार की नृत्यांगना थी, जिसका रूप लावण्य मनोहारी और अतुलनीय था। सरजू बहुत ही खुशमिजाज और शिष्ट थी। सरजू के व्यवहार में एक अजीब आकर्षण था। सरजू  के अनुपम सौंदर्य पर सुकेत का राजा भी मोहित हो गया था। दोनों के प्रणय की चर्चा जगत प्रसिद्ध हो गई। सरजू की अलौकिक संदरता के कारण उसे “लाड़ी” शब्द से अभिहित किया गया है। लाड़ी का पहाड़ी बोली में अभिप्राय रूपसी नारी से है।
लोक मान्यता है कि सरजू का न केवल रूप अनुपम था, बल्कि वह तंत्र विद्या में भी पारंगत थी। उसकी सुन्दरता के मुरीद सुकेत रियासत के नौ गढ़ के ठाकुर भी थे। जैसा कि गीत में उल्लेखित है-
लाड़ी सरजूए नौ बोलो गढ़ा री मड़ेगी।
अर्थात् सरजू नौ गढ़ों  की स्वामिनी थी। आज कल प्रचलित गीत में यूं गाया जाता है-
लाड़ी सरजुए नौये बोलो घरा री मड़ेगी तू बांकी सरजुए…
अर्थात् लाड़ी सरजू नये घर की स्वामिनी है, जबकि ऐतिहासिक अंतर्वस्तु के अनुसार सरजू नये घर नहीं बल्कि नौ गढ़ों की स्वामिनी थी। अगली पंक्ति में उल्लेख है-
लाड़ी सरजुऐ माड़ी यारै चेले री बेेबे लोगू दै बोलणे।
अर्थात् सरजू का तान्त्रिक  पति देखने में अपेक्षाकृत सुन्दर नहीं है।
दूसरे पद में लिखा है-
लाड़ी सरजुऐ डाड़ी बोलौ शुकी सतोषे तेरे घरै आंगणे
अर्थात् सरजू के आंगन में पेड़ सूख गया है जो अशुभ है। आगे की पक्ति में_
लाड़ी सरजुऐ मौरिय लागू मा दोषे  जीवंदै बेशू मटरै।
अर्थात् यदि मर गई तो अतृप्त आत्मा होकर दोष से त्रस्त करूंगी, पर यदि जिंदा रही तो मटर में बैठुगी। आगे की पक्ति में सुकेत की राजधानी पांगणा के बेहड़े का उल्लेख है, जहां शिव मंदिर से बेहड़े तक साठ सोपान हैं–
लाड़ी सरजुऐ शाठ् बोलौ पौड़ी रा सवाणा पांगणे बेहड़े दे।
लाड़ी सरजुऐ नौवा बोलौ सुटड़ु सलाणा माहुंनागे मेड़े ले।।
अर्थात माहुंनाग मेले में नया सूट पहनकर जाना है। आगे की पंक्तियो में सरजू का प्रेमी सरजू की बेवफाई यानि राजा के साथ संबंधो को सहने न करते हुए सरजू के घर आतिथ्य में खिचड़ी खाने व मन के भावों  के बखान का वर्णन प्रेमयुग की अभिव्यक्ति है-
लाड़ी सरजुए करे यारे खिचड़ी गै पाकी, आज तेरे पाओणे।
लाड़ी सरजुए भीतर गे जड़दी छाती,बारे नी बखाड़दी।।
आगे की पंक्ति में लाड़ी सरजू के पतन का संकेत है, जो प्रेमी को शंकाकुल कर रहा है, क्योंकि प्रेमी अपनी प्रेमाभिव्यक्ति के हाड-माँस में व्याप्त होने का वर्मन करता है-
लाड़ी सरजुए कुणी यारा पापिए ना राड़ा, केऊवा जंवाडला।
लाड़ी सरजुए शाह बोलो बाड़ियै बाड़ा,हाड पराणुये।
आगे की पंक्ति में प्रेमी मन के उमड़ते प्रेम की व्यग्रता और उत्कंठा का वर्षण कर अपने लगाव की बेबसी को व्यक्त करता है-
लाड़ी सरजुए डाड़ी यारों भरे गे रसै,पाणी फणैरूए।
लाड़ी सरजुए नहीं यारों आपणे बसे,भली तेरी मुरता।।
अंतिम पंक्ति में-
लाड़ी सरजुए काण्ढे बोलो कुफरे दे, देया सरपे फेरा।
लाड़ी सरजुए बोलो आधा सुझा हरटो,पूरा पांगणा बेहड़ा।। 
सरजू का लोकगीत जहाँ नायिका के गुण-दोष का निरूपण करता है, वहीं प्रेमावेश और समाज की भर्त्सना का संदेश भी समाज को देता है। आज भी लाड़ी सरजू की नाटी श्रृंखलावद्ध नृत्य में सबसे पहले गाई जाती है। लाड़ी सरजू की नाटी सुस्त लय में गाने का विधान है। निस्संदेह यह नाटी अपनी रागात्मकता और अंतर्वस्तु के लिए प्रसिद्ध है। जो ऐतिहासिकता और सामाजिकता के स्वरूप व व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती है।
गत दिनों इसी सत्य घटना पर आधारित वास्तविक जगह “पांगणा बेहड़े” में सरजू गीत की शूटिंग भी पूर्ण हो गयी। सरजू लोकगीत की शूटिंग काफी चर्चा और आकर्षण का विषय बनी रही। वजह बड़ी विचित्र है, क्योंकि इस ऐतिहासिक  लोकगीत का सीधा संबंध पांगणा क्षेत्र  से है।प्रेम गीत के पात्रों के निजी जीवन के अनुभवों की ताजगी व राजसी हुकुमत के दौर की रोमांचक घटना के समय के साथ अनेक पद बन गए। लोकगायक रंजीत भारद्वाज ने इस गीत की शूटिंग के माध्यम से यह दर्शा दिया कि उनके अंदर गीतकार के साथ-साथ कुशल निर्देशन का जज़्बा भी है। शिवानी सर्वोत्तम नर्तकी है। सुप्रसिद्ध सरजू के इस लोकगीत पर थिरकने वाली शिवानी ने बहुत अधिक परिश्रम किया है। चंद्र कांता, ममता ठाकुर, सोनिया ठाकुर और प्रिया ने नृत्य में शिवानी का अच्छा साथ दिया है। नर्तक मनोज ठाकुर के साथ राज चौहान, पुरानी पीढ़ी के कलाकार रोशन लाल, सुनील जैसे नर्तकों ने अपनी नृत्य कला से मन मोह लिया। कोरियोग्राफर (डांस मास्टर) सुनील ने नृत्य निर्देशन किया है। इस एलबम के संगीतकार सुरेन्द्र नेगी ने संगीत तैयार किया है। आइसो स्टुडियो बंजार (कुल्लू) के प्रिंस हैरी कैमरा मैन हैं। निर्देशन व गीत रंजीत भारद्वाज का है।
इस लोकगाथा को शुटिंग के माध्यम  से नए रूप में  उभारना के लिए सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डाक्टर हिमेन्द्र बाली हिम, डाक्टर जगदीश शर्मा और व्यापार मंडल पांगणा के अध्यक्ष सुमित गुप्ता ने रंजीत भारद्वाज व साथियों का जहाँ आभार व्यक्त किया है, वहीं शूटिंग में सक्रिय सहयोग के लिए रंजीत भारद्वाज व दल के सभी सदस्यों ने करसोग के विधायक हीरालाल व लोक निर्माण विभाग पांगणा के सहायक अभियंता संजय शर्मा तथा अन्य सभी स्थानीय सहयोगियों का आभार व्यक्त किया है।
सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा हिमाचल प्रदेश

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