सी. राजगोपालाचारी

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक कुशल राजनीतिज्ञ और बेहतरीन लेखक चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का जन्म आज के दिन 10 दिसम्बर 1878 को तमिलनाडु के सेलम जिले के धोररापल्ली गाँव में हुआ था।
 प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में हुई, मद्रास के प्रेसीडेन्सी कालेज से बीए व वकालत की पढ़ाई की। उन्हें “चक्रवर्ती-थिरुमगम” के लिये साहित्य-अकादमी पुरस्कार मिला। मद्रास मे स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवाई की। स्वतंत्रता के बाद बंगाल के राज्यपाल बने। 1952 के आम चुनावों में मद्रास के मुख्यमंत्री बने। बाद में उन्होंने स्वतंत्र-पार्टी की स्थापना की। जिस के टिकट पर महारानी गायत्री देवी रिकार्ड मतों से सांसद चुनी गई थीं। नेहरू से मतभेदों को देखते हुए उन्होंने सरदार पटेल साहब को स्वतंत्र-पार्टी की बागडोर सम्भालने का आग्रह भी किया था, जिसे सरदार साहब ने अस्वीकार कर दिया था।
उनकी लिखी पुस्तक वेदान्त के कुछ अंश यहाँ पेश हैं- शरीर सुन्दर एक जादू भरा उपकरण है, जिसके साथ उसका स्वामी आत्म-विलक्षण रीति से अभिन्न हो जाता है। उसी तरह आत्मा भी परमात्मा का उपकरण है। परमात्मा उसके अन्दर निवास करता है और उसका उपयोग करता है। ऐसा क्यों? हम नहीं जान सकते। शरीर और उसकी सूक्ष्म इन्द्रियों को अपने स्वामीआत्मा के प्रति निष्ठावान होना चाहिए। साथ ही अच्छे उपकरणों के रूप में उसके कार्य करने चाहिये। अर्थात व्यक्ति को परमात्मा का उपकरण बनकर कर्म, वाणी और सुविचारों से उसे समर्पित होना चाहिए।
मूर्ति पूजामूलक दर्शनशास्त्रों से जिस भाग्यवाद का उदय हुआ है, उसमें और  वेदान्त में यही अन्तर है। प्रत्येक घटना का कारण तो होता ही है, लेकिन घटना के कारण को न समझकर हम, उसे भाग्य मान बैठते हैं। प्रत्येक अच्छे, बुरे विचार और कर्म का हम पर तुरन्त असर होता है, जिससे व्यक्ति के चरित्र का विकास उसी की बुनियाद पर होता है। और यही क्रम उत्तरोत्तर प्रगतिपूर्वक जारी रहता है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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