विवादों के घेरे में अखिल भारतीय कुर्मि क्षत्रिय महासभा के कार्यवाहक अध्यक्ष नन्द कुमार बघेल, पारदर्शी तरीके से निर्वाचित हों महासंघ के सभी पदाधिकारी


हवलेश कुमार पटेल, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

अखिल भारतीय कुर्मि क्षत्रिय महासभा के कार्यवाहक राष्ट्रीय अध्यक्ष नन्द कुमार बघेल जो कूर्मि क्षत्रिय किसान मजदूर महासभा व मतदाता जागरूकता अभियान के सर्वेसर्वा भी हैं। पूरे देश में कुर्मियों को एक करने की मुहिम पर निकले हैं। शुरूआत उन्होंने यूपी से की, उसके बाद वे राजस्थान में ताबडतोड़ दौरा करके 3-4 मार्च 2021 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में होने वाले अखिल भारतीय कुर्मि क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए लोगों को आमंत्रित कर रहे हैं।

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मेरठ निवासी समाज के एक जिम्मेदार की मानें तो यूपी दौरे के दौरान मेरठ में श्री बघेल ने कहा कि मुझे अखिल भारतीय कुर्मि क्षत्रिय महासभा का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाने के बाद कोई भी पदाधिकारी मिलने नहीं आया है, इसलिए अकेले ही दौरा कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि मार्च 2021 को रायपुर छत्तीसगढ़ में आयोजित होने वाले अधिवेशन में दोनों गुटों को बुलाकर एकता बनाने की कोशिश करूंगा। इस दौरान श्री बघेल पर आरोप लगे कि वे अखिल भारतीय कुर्मि क्षत्रिय महासभा के कार्यवाहक राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद अपने वाहन पर पर कूर्मि क्षत्रिय किसान मजदूर महासभा का बोर्ड लगाये घूम रहे हैं, जबकि यदि वे अखिल भारतीय कुर्मि क्षत्रिय महासभा का कार्यवाहक अध्यक्ष होने के नाते अगर महासभा के राष्ट्रीय अधिवेशन की तैयारी कर रहे हैं तो उन्हें अपनी गाड़ी पर अखिल भारतीय कुर्मि क्षत्रिय महासभा का बोर्ड लगाना चाहिए था, अन्यथा किसी का भी नहीं लगाते। आरोप है कि श्री बघेल की यह कार्यशैली संशय उत्पन्न करने वाली है।

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कुर्मी समाज के एक जिम्मेदार की मानें तो श्री बघेल कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं। उन्होंने किसी मौके पर कहा है कि कुर्मी समाज का भला तभी होगा, जब वे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनायेंगे। उनका मानना है कि अखिल भारतीय कुर्मि क्षत्रिय महासभा के कार्यवाहक राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा पार्टी विशेष की तरफदारी करना समाज को बेचने जैसा है। इससे समाज का कोई भला नहीं होगा, बल्कि विघटन की खाई और अधिक बढ़ जायेगी।

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जानकारों की मानें तो कुर्मी-पटेल क्षत्रिय समाज में बढ़ती गुटबाजी जहां कुछ लोगों के अहम को संतुष्ट कर रही है, वहीं समाज का भारी नुकसान भी कर रही है। सबसे ज्यादा खराब हालत अखिल भारतीय कुर्मी महासभा में व्याप्त गुटबाजी की है। हालत ये है कि यदि किसी संगठन का कोई पदाधिकारी किसी को फोन भी करता है तो कई बार सामने वाला मात्र इसलिए मुंह चुराता है कि फोन करने वाला समाज के दूसरे गुट का समर्थक है।


नोएडा में रह रहे कानपुर के मूल निवासी रिटायर्ड कर्नल एसएन कटियार के अनुसार देशभर में अखिल भारतीय कुर्मी महा संघ के तीनों समूहों के सभी राज्य और राष्ट्रीय स्तर के सभी पदाधिकारियों को एक साथ इस्तीफा दे देना चाहिए। उसके बाद सभी पदों पर लोकतांत्रिक व पारदर्शी ढंग से चुनाव कराया जाना चाहिए। भले ही उसमें कुछ खर्च ज्यादा भी हो जाये। उन्होंने सुझाया है कि इसके लिए अंतरिम चुनाव अधिकारी की नियुक्ति करें और नये उम्मीदवारों को निश्चित कार्यकाल के लिए चुना जाना चाहिए, जो स्वतंत्र समिति के माध्यम से वित्तीय गड़बड़ी को हल करें। उन्होंने महासभा के हित में एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कहा कि भले ही इसके लिए ईवीएम को किराये पर जुटाना पडे, तो वह भी कर लेना चाहिए।
एक अन्य कुर्मी समाज के जिम्मेदार के अनुसार चुनाव में पारदर्शिता लाने के लिए एक वेबसाईट बनायी जानी चाहिए, जिसमें वोट करने की सुविधा हो और देशभर के कुर्मी समाज के लिए अपने पंसदीदा प्रत्याशी को वोट कर सकें। यह कार्य अपेक्षाकृत कम खर्च में भी सम्पन्न हो जायेगा।

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समाज के एक जिम्मेदार ने एक कहानी के माध्यम से कुर्मी समाज की स्थिति बयान की है। उनके अनुसार एक होस्टल कैंटीन वाले द्वारा नाश्ते में रोज-रोज खिचड़ी देने से परेशान 80 छात्रों ने होस्टल वार्डन से शिकायत की और बदल-बदल के नाश्ता देने की मांग की। 100 में से सिर्फ 20 छात्र ऐसे थे, जिनको खिचड़ी बहुत पसंद थी और वो छात्र चाहते थे कि खिचड़ी रोज ही बननी चाहिए। बाकी के 80 छात्र परिवर्तन चाहते थे। वार्डन ने वोट करके नाश्ता तय करने को कहा। जिन 20 छात्रों को खिचड़ी बहुत पसंद थी, उन्होंने खिचड़ी के लिए वोट किया। बाकी बचे 80 लोगों ने आपस में कोई सामंजस्य नहीं रखा और कोई वार्तालाप भी नहीं किया। लिहाजा सभी ने अपनी बु(ि एवं विवेक से अपनी रूचि अनुसार वोट दिया। उनमें से 18 ने डोसा चुना, 16 ने परांठा, 14 ने रोटी, 12 ने ब्रेड बटर, 10 ने नूडल्स, और 10 ने पूरी सब्जी को वोट दिया। इसका परिणाम यह निकला कि उस कैंटीन में आज भी बहुमत वाले वो सभी 80 छात्र इसलिए रोज खिचड़ी ही खाते हैं, क्योंकि वो अल्पमत वाले 20 छात्र एकजुट रहे। इस उदाहरण का आशय यह है कि जब तक 80 प्रतिशत वाले बंटे रहेंगे, तब तक 20 प्रतिशत वालों का वर्चस्व रहेगा। इसलिए संगठित रहो, नही तो खिचड़ी ही खानी पड़ेगी।

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