संयम और सन्तोष

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

सीटा के ईसाई मठ में महन्त लूकास ने एक दिन सभी शिष्यों को प्रवचन देते हुए यह कहा-ईश्वर करे तुम सब भुला दिये जाओ। यह सुनकर अधिकांश शिष्य चुप रहे, पलटकर पूछने का साहस न कर सके, पर एक शिष्य अपनी जिज्ञासा को दबा न सका। उसने कहा-श्रीमन्त! आप यह क्या कह रहें हैं? इसका अर्थ तो यह हुआ कि कोई भी हमसे जगत कल्याण की सीख न ले पायेगा ? महन्त ने मुस्कराकर कहा-तुम सब भली भांति जानते हो कि पुराने समय में लगभग सभी लोग सत्य के मार्ग पर चलते थे। अर्थात् तब किसी को किसी के अनुकरण करने की जरूरत नहीं थी। सभी धर्म के मार्ग पर चलते थे, शुभ कर्म करते समय यह नहीं सोंचते कि उन्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित किया गया है। वे अपने पड़ोसी से भी इसलिये प्रेम करते थे, क्योंकि इसे वह जीवन का अनिवार्य अंग मानते थे। वे प्रकृति के नियमों का पालन करते, वे अपनी जरूरत से ज्यादा चीजों का संग्रह नहीं करते थे। वे जानते थे कि इस दुनिया में एक अतिथि के रूप में आये हैं। फालतू बोझ तले दबने जरूरी नहीं है। वे स्वतंत्रतापूर्वक जरूरी वस्तुुओं का आपस में आदान-प्रदान करते थे। वे किसी वस्तु पर न तो अधिकार जताते और न ही किसी से ईर्ष्या रखते थे।
 इसी कारण उनके जीवन के किसी भी पक्ष के बारे में कुछ भी कहा-लिखा नहीं गया। उनका इतिहास भी नहीं है और वे कहानियों में भी नहीं मिलते, क्योंकि जब अच्छाई इतनी सर्व सुलभ और साधारण बात हो जाती है तो उसका पालन करने वालों की प्रशंसा भला कौन करेगा?  इसलिये आप लोग सद्कर्म करते रहो, कौन याद करेगा,  व्यर्थ के इस चिन्तन में मत पड़ो।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ 

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