स्वर्ग की अप्सरा

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

इंदरकोट महल के एक कक्ष में कोटरानी दो दासियों से अपने को सजा सवाँर रही थी। वृद्ध हो चली दासी गुलाबो नाइन तनिक दूर हटकर आबनूस के पलंग पर बैठी कोटरानी के निखरे रूपलावण्य को अपनी भीगी आँखों से निहारा, फिर परम्परा के तौर पर अपने दाहिने हाथ की अनामिका से बाईं आंख की कोर का काजल लेकर कोटरानी के दाहिने पांव के तलवे में लगा दिया। यह शगुन भी था और दुल्हन को बुरी नजर से बचाने की परम्परा भी थी। उसके बाद महारानी की ओर देखते हुए बोली-बलीहारी जाँऊ! आप बहुत सुन्दर लग रही हैं, स्वर्ग की अप्सरा जैसी। इसके बाद गुलाबो के मुँह से एक शब्द ना निकला। आँखे डबडबाईं और आँसू लुढ़क कर गालों पर बह चले।
 गुलाबो को रोती देख कोटरानी ने भर्राई आवाज मे कहा-रो क्यों रही है गुलाबो ? आज अपना नेग न लेगी?  मुझे सुहाग की सेज तक छोड़कर न आयेगी? इतना मुश्किल से बोल सकी कोटरानी और खुद के आँसू बह निकले। गुलाबो की विवाहित युवा बेटी महारानी और अपनी माँ को आश्चर्य से रोते हुए देख रही थी। उसे क्या पता था कि कश्मीर की भाग्यहीन महारानी पहली या दूसरी बार नहीं, चौथी बार दुल्हन बनी थी। उन्तीस साल पहले यानि वर्ष 1310 में जब कश्मीर के महाराजा थे, इन्दर महेन्दर राज राजेश्वर 10008 श्री सहदेव महराज। पहली बार कोटरानी तब दुल्हन बनी थी। वह कश्मीर के प्रधानमंत्री प़डित रामचन्द्र की बेटी थी।
कश्मीर के महान इतिहिसकार कल्हण ने अपनी पुस्तक “राज-तारंगिणी” में जिन राजाओं के इतिहास का वर्णन किया है, उस क्रम में मूर्तिभंजक राजा हर्षदेव (1089-1110) के बाद सन् 1286 में सिंहदेव नामक राजा ने एक नये राजवंश की स्थापना की थी। सन् 1301 में उसकी मौत के बाद उसका भाई सहदेव सिंहासनारुढ़ हुआ। राजा हर्षदेव के समय से ही विदेशी आक्रांता छुटपुट तौर पर बाहरी कश्मीर पर आक्रमण करते रहे थे, लेकिन वो कभी टिक ना पाये थे। अब सहदेव के शासन में मंगोल (जो मध्य एशिया के खूँखार लड़ाकू जाति थी) ने कश्मीर पर अचानक धावा बोल दिया। उस लुटेरे मंगोल का सरदार का नाम था दालुचा। वह ख्वारज्म के राजा का सेनापति था और चंगेजखाँ के चगताई वंश का राजकुमार था।
कोटरानी की उम्र उस समय लगभग 20-22 वर्ष थी। जब सन् 1320 की बसंत ऋतु में बारमूला के मार्ग से दालुचा अपने सत्तर हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ कश्मीर में घुस आया। महाराजा सहदेव ने अपनी छोटी सी सेना के साथ मोर्चा सम्भाला, लेकिन अपने से कई गुना ज्यादा आतताइयों और लुटेरों के सामने वह ज्यादा दिन प्रतिरोध न कर सका और बचे कुछ सैन्य टुकडी़ के साथ किश्तवाड़ में शरण ली। दालुचा ने कश्मीर में कत्लेआम का हुक्म दिया। मंगोल लुटेरों ने हजारों पुरुषों का कत्ल किया और स्त्रियों बच्चों को गुलाम बनाकर बाजारों में बेंच दिया। नगरों और गाँवों को जलाकर राख कर दिया। अन्न के सारे भण्डार लूटकर घोड़ों को चारे में खिला दिया। लोग जान बचाने के लिए पहाड़ और जंगल में जा छिपे, लेकिन संगठित जालिम लुटेरों ने जिसे भीे पकड़ा उसे ढ़ूँढ कर मार दिया।
  इधर श्रीनगर को अपने हालपर छोड़कर प्रधानमन्त्री पंडत रामचन्द्र परिवार सहित डरकर पहले ही कश्मीर के ल़ार जिले के गगनगीर दुर्ग में शरण मांगी। कोटरानी शिक्षित और समझदार तरुणी थी। अपने पिता को कायरों की भांति भागते और दुर्ग में शरण लेते देख वह लज्जित महसूस करने लगी। उसे सबसे ज्यादा घृणा धर्म के ठेकेदारों से हो गयी। उस समय कश्मीर में हिन्दू शैवों और बौद्धों में ठनी हुई थी। शैव बौद्धौं को फूटी आँख भी नहीं देखते और उनका अपमान करते। उस समय हिन्दू शैवों का सबसे बड़ा धर्माचार्य (ठेकेदार) दादा स्वामी भट्ट नामक धर्म गुरु था, जो बौद्धौं का कट्टर दुश्मन था। समाज का यही बंटवारा आगे चलकर कश्मीर और देश का दुर्भाग्य बना और देश गुलाम बना। क्रमशः…
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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