कल्याण के प्रतीक हैं भुण्डल के भोलेनाथ

डॉ. जगदीश शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिमाचल प्रदेश के मण्डी जिला की उप-तहसील पांगणा के जाच्छ पटवारवृत के अंतर्गत वन-निरीक्षण चौकी जाच्छ से खनीऊड़ी मार्ग पर लगभग साढ़े पांच किलोमीटर की दूरी पर खुबसूरत देवदार, कायल के हरे-भरे जंगलों और ऊँचे पहाडों से सुसज्जित भुण्डल का वातावरण पर्यटकों का मन मोह लेता है। भुण्डल अपने आगोश में कई खूबसूरत दिव्य स्थलों को छिपाए हुए है। भुण्डल तीन हिस्सों में बंटा है- पहला हिस्सा वाहन योग्य खनीऊड़ी मार्ग से जुड़े होने के कारण मुख्य भुण्डल कहलाता है। पहले यह स्थान वीरान था। जाच्छ-खनीऊड़ी सड़क बनने के बाद आस-पास के गांव  के लोग यहाँ आकर बस गए तो इस स्थान के आबाद होने से बहुमुखी विकास शुरू हो गया। इसी भुण्डल में कल-कल अविरल बहती जलधारा के तट पर विशाल वृक्ष के नीचे भुण्डल निवासी चन्द्रमणी द्वारा जन सहयोग से एक विशाल शिला पर स्थापित शिवलिंग विशेष महत्व रखता है।
चन्द्रमणी के अनुसार उन्हें देवलोक का उपहार रूपी यह शिवलिंग लगभग दो वर्ष पूर्व राजकीय प्राथमिक पाठशाला भुण्डल के मैदान में मिला। उन्हे लगा कि कोई अदृश्य दिव्य शक्ति उन्हें इस अद्भुत पत्थर ( शिवलिंग ) की ओर आकर्षित कर रही है तथा इसकी साफ-सफाई करने के लिए प्रेरित कर रही है। चन्द्रमणी ने इस पत्थर (शिवलिंग) को उठाकर इसके ऊपर जमी मिट्टी की परत को हटाया तो वह आश्चर्य में पड़ गया। इस पत्थर ( शिवलिंग) पर वृताकार नौ उपन्नयन/जनेऊ बने थे।
आध्यात्मिक और धार्मिक भावना से ओतप्रोत चन्द्रमणी ने कर्मसिंह आदि स्थानीय नागरिकों के सहयोग से इस शिवलिंग को स्थापित करने का निर्णय लिया। इन्होंने 18 देओठियों के प्रतिष्ठित, कुशल और विद्वान देव महासू के मुख्य गूर रामचु राम जी को अवगत करवाकर इस विषय में विचार-विमर्श किया। सहयोग, प्रेम, सदभाव, प्रभु सेवा के संस्कारों से भरे रामचु राम जी ने मनुष्य के मोक्ष और जनकल्याण हेतु इस शिवलिंग को भुण्डल मे कल-कल बहती जलधारा के दायीं ओर विशाल पेड़ के नीचे बहुत छोटे से गुफानुमा अनूठे स्थान पर विशाल चट्टान पर स्थापित करने का सुझाव दिया। 2018 में महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर धर्मनिष्ठ और कर्तव्यपरायण, सद्भावी भुण्डल वासियों ने निर्धारित स्थान पर इस शिवलिंग की स्थापना कर सहकारिता व सनातन धर्म रक्षा की अनूठी मिसाल पेश की।
इस अवसर पर शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान शिवलिंग के मस्तक पर त्रिशूलनुमा तिलक लगाया गया। अचरज का विषय है कि अनेक बार के जलाभिषेक, मुसलाधार वर्षा, भारी बर्फबारी के बाबजूद भी इस चमत्कारी तिलक के निशान आज भी शिवलिंग पर विद्यमान हैं। भुण्डल के  प्रथम भोलेनाथ मंदिर के श्री विग्रह दर्शन लिए श्रद्धालु आने लगे तथा श्रद्धा सुमन अर्पित कर स्वयं को धन्य करने लगे। चन्द्र मणी जी का कहना है कि यह भारतीय संस्कृति और दिव्य शक्तियों का ही प्रभाव है, जिसे विनष्ट नही किया जा सकता। इस शिवलिंग ने यहाँ की पहाड़ी संस्कृति और को नया जीवन प्रदान किया है।
आज यह शिवलिंग भुण्डल वासियों की अटूट आस्था और विश्वास का केन्द्र है। इस शिवलिंग पर छत नहीं है।चन्द्रमणी, कर्म सिंह और अन्य भुण्डल वासी सहकारिता के बल पर जल्द ही इस स्थान पर पहाड़ी शैली के लघु शिवालय / देओरे का निर्माण करने का एक और आदर्श कदम उठाने जा रहे हैं। सुकेत संस्कृति साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डाक्टर हिमेन्द्र बाली “हिम”, भुण्डल क्षेत्रं की सांस्कृतिक अध्ययन यात्रा कर लौटे पुरातत्व चेतना संघ मंडी द्वारा राज्य स्तरीय पुरातत्व चेतना पुरस्कार से सम्मानित डाक्टर जगदीश शर्मा, व्यापार मंडल पांगणा के अध्यक्ष सुमित गुप्ता, समाजसेवी पुनीत गुप्ता और विपुल शर्मा का कहना है कि शांत, एकांत, श्रद्धा और विश्वास की अलौकिक प्रेरणा देते दैविय चमत्कारों से ओत-प्रोत भुण्डल के संपूर्ण क्षेत्र को  हिमाचल के पर्यटन मानचित्र पर रेखांकित किया जाए।
पांगणा करसोग हिमाचल प्रदेश

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