हर दिल की धड़कन थी दिलकश साधना

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भारतीय सिने तारिका साधना का जन्म 2 सितम्बर, 1941 को सिन्ध प्रांत स्थित कराची में हुआ था। 74 वर्षीय मशहूर अभिनेत्री साधना की मृत्यु 25 दिसंबर 2015 को मुंबई के हिंदुजा हाॅस्पिटल में मृत्यु हो गयी। साधना कुछ दिनों से बीमार चल रही थीं। पिछले साल मुँह के कैंसर की वजह से साधना की सर्जरी हुई थी। हरि शिवदासानी जो अभिनेत्री बबीता के पिता हैं, उनके पिता के भाई हैं। साधना शिवदासानी अपने माता पिता की एकमात्र संतान थीं और 1947 मे देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार कराची छोड़कर मुंबई आ गया। साधना का नाम उनके पिता मे अपनी पसंदीदा अभिनेत्री साधना बोस के नाम पर रखा था। उनकी माँ ने उन्हें आठ वर्ष की उम्र तक घर पर ही पढा़या था। उनके पिता का नाम शेवाराम व माता का नाम लालीदेवी था। उनके पति आर.के.नैय्यर मशहूर संगीत कार थे।
साधना अभिनीत मुख्य फिल्में लव इन शिमला, मेरे मेहबूब, आरजू, वक्त, मेरा साया, हम दोनों, अमानत, इश्क पर जोर नहीं, परख, प्रेमपत्र, गबन, एक फूल दो माली और गीता मेरा नाम हैं। उन्हें आईफा द्वारा 2002 में लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्राप्त हुआ था। अपने बालों की स्टाइल की वजह से साधना बहुत प्रसिद्ध थीं, उनके बालों की कट स्टाइल साधना कट के नाम से जानी जाती है।


साधना ने फिल्म अबाणा से अपना फिल्मी सफर आरम्भ किया था। उन्होंने हिन्दी फिल्मों से जो शोहरत पाई और जो मुकाम हासिल किया, वह किसी से छिपा नहीं है। साधना का पूरा नाम साधना शिवदासानी (बाद में नैय्यर) था। माता-पिता की एकमात्र संतान होने के कारण साधना का बचपन बड़े प्यार के साथ व्यतीत हुआ था। 1947 में भारत के बंटवारे के बाद उनका परिवार कराची छोड़कर मुंबई आ गया था। इस समय साधना की आयु मात्र छः साल थी। रूपहले पर्दे पर अपनी दिलकश अदाकारी से घर-घर में पसंद की जाने वाली साधना का विवाह आरके नैय्यर के साथ हुआ था, जिस कारण वह साधना नैय्यर के नाम से भी जानी गईं, किंतु उनका साधना नाम ही प्रसिद्ध रहा।
जब साधना स्कूल की छात्रा थीं और नृत्य सीखने के लिए एक डांस स्कूल में जाती थीं, तभी एक दिन एक नृत्य-निर्देशक उस डांस स्कूल में आए। उन्होंने बताया कि राजकपूर को अपनी फिल्म के एक ग्रुप-डांस के लिए कुछ ऐसी छात्राओं की जरूरत है, जो फिल्म के ग्रुप डांस में काम कर सकें। साधना की डांस टीचर ने कुछ लड़कियों से नृत्य करवाया और जिन लड़कियों को चुना गया, उनमें से साधना भी एक थीं। इससे साधना बहुत खुश थीं, क्योंकि उन्हें फिल्म में काम करने का मौका मिल रहा था। राजकपूर की वह फिल्म थी श्री 420। डांस सीन की शूटिंग से पहले रिहर्सल हुई। वह गाना था, रमैया वस्ता वइया..। साधना शूटिंग में रोज शामिल होती थीं। नृत्य निर्देशक जब जैसा कहते साधना वैसा ही करतीं। शूटिंग कई दिनों तक चली। लंच-चाय तो मिलते ही थे, साथ ही चलते समय नगद मेहनताना भी मिलता था।


एक दिन साधना ने देखा कि श्री 420 के शहर में बड़े-बड़े बैनर लगे हैं। फिल्म रिलीज हो रही है। ऐसे में एक्स्ट्रा कलाकार और कोरस डांसर्स को कोई प्रोड्यूसर प्रीमियर पर नहीं बुलाता, इसलिए साधना ने खुद अपने और अपनी सहेलियों के लिए टिकटें खरीदीं। साधना यह चाहती थीं कि वे पर्दे पर डांस करती हुई कैसी लगती हैं, उनकी सहेलियाँ भी देखें। सहेलियों के साथ साधना सिनेमा हाॅल पहुँचीं। फिल्म शुरू हुई। जैसे ही गीत रमैया वस्तावइया.. शुरू हुआ, तो साधना ने फुसफुसाते हुए सहेलियों से कहा-इस गीत को गौर से देखना, मैंने इसी में काम किया है। सभी सहेलियाँ आंखें गड़ाकर फिल्म देखने लगीं, लेकिन गाना समाप्त हो गया और वे कहीं भी नजर नहीं आईं। तभी सहेलियों ने पूछा, अरे तू तो कहीं भी नजर ही नहीं आई। साधना की आंखें उनकी बात सुनकर डबडबा गईं। उन्हें क्या पता था कि फिल्म के संपादन में राजकपूर उनके चेहरे को काट देंगे, लेकिन यह एक संयोग ही कहा जायेगा कि जिस राजकपूर ने साधना को उनकी पहली फिल्म में आंसू दिए थे, उन्होंने आठ साल बाद उनके साथ दूल्हा दुल्हन में हीरो का रोल निभाया। वर्ष 1955 में राज कपूर की फिल्म श्री 420 के गीत ईचक दाना बीचक दाना में एक कोरस लड़की की भूमिका मिली थी साधना को, उस वक्त वो 15 साल की थीं। साधना को भारत की पहली सिंधी फिल्म अबाणा ;1958द्ध में काम करने का मौका मिला, जिसमें उन्होंने अभिनेत्री शीला रमानी की छोटी बहन की भूमिका निभाई थी और इस फिल्म के लिए इन्हें एक रुपए की टोकन राशि का भुगतान किया गया था। इस सिंधी खूबसूरत बाला को सशधर मुखर्जी ने देखा, जो उस वक्त बहुत बड़े फिल्मकार थे। सशधर मुखर्जी को अपने बेटे जाॅय मुखर्जी के लिए एक हिरोइन के लिए नये चेहरे की तलाश कर रहे थे।


वर्ष 1960 में लव इन शिमला रिलीज हुई, इस फिल्म के निर्देशक थे आरके नैयर, और उन्होंने ही साधना को नया लुक दिया साधना कट। दरअसल साधना का माथा बहुत चौड़ा था उसे कवर किया गया बालों से, उस स्टाईल का नाम ही पड़ गया साधना कट। 1961 में एक और हिट फिल्म हम दोनों में देव आनंद के साथ इस ब्लैक एंड व्हाईट फिल्म को रंगीन किया गया था और 2011 में फिर से रिलीज किया गया था। 1962 में वह फिर से निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा असली-नकली में देव आनंद के साथ थीं। 1963 में टेक्नीकलर फिल्म मेरे मेहबूब एचएस रवैल द्वारा निर्देशित उनके फिल्मी कैरियर ब्लाॅकबस्टर फिल्म थी। यह फिल्म 1963 की भी ब्लाॅकबस्टर फिल्म थी और 1960 के दशक के शीर्ष 5 फिल्मों में स्थान पर रहीं। मेरे मेहबूब में निम्मी पहले साधना वाला रोल करने जा रही थी, न जाने क्या सोच कर निम्मी ने साधना वाला रोल ठुकरा कर राजेंद्र कुमार की बहन वाला का रोल किया। साधना के बुर्के वाला सीन इंडियन क्लासिक में दर्ज है। साल 1964 में उनके डबल रोल की फिल्म रिलीज हुई, जिसमें मनोज कुमार हीरो थे और फिल्म का नाम था वो कौन थी। सफेद साड़ी पहने महिला भूतनी का यह किरदार हिन्दुस्तानी सिनेमा में अमर हो गया। इस फिल्म से हिन्दुस्तानी सिनेमा को नया विलेन भी मिला जिसका नाम था प्रेम चोपड़ा। साधना को लाजवाब एक्टिंग के लिए प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में पहला फिल्मफेयर नामांकन भी मिला था। क्लासिक्स फिल्म वो कौन थी, मदन मोहन के लाजवाब संगीत और लता मंगेशकर की लाजवाब गायकी के लिए भी याद की जाती है। नैना बरसे रिमझिम का आज भी कोई जवाब नहीं है। इस फिल्म के लिए साधना को मोना लिसा की तरह मुस्कान के साथ शो डाट कहा गया था। यह फिल्म बाॅक्स ऑफिस पर हिट थी। साल 1964 में साधना का नाम एक हिट से जुड़ा यह फिल्म थी राजकुमार, हीरो थे शम्मी कपूर। राजकुमार भी साल 1964 की ब्लाॅकबस्टर फिल्म थी। साल 1965 की मल्टी स्टार कास्ट की फिल्म वक्त रिलीज हुई जो इस साल की ब्लाॅकबस्टर भी थी, जिसमें राज कुमार सुनील दत्त, शशि कपूर, बलराज साहनी, अचला सचदेव और शर्मिला टैगोर जैसे सितारे थे। वक्त में साधना ने तंग चूड़ीदार-कुर्ता पहना जो इस पहले किसी भी हिरोइन ने नहीं पहना था।

साल 1965 साधना के लिए एक और कामयाबी लाया था, इसी साल रिलीज हुई रामानन्द सागर की आरजू जिसमें शंकर जयकिशन का लाजवाब संगीत और हसरत जयपुरी का लिखा यह गीत जो गाया था लता मंगेशकर ने अजी रूठ कर अब कहाँ जाइयेगा ने तहलका मचा दिया था। फिल्म आरजू में भी साधना ने अपनी स्टाईल को बरकरार रखा। साधना ने रहस्यमयी फिल्में मेरा साया (1966) सुनील दत्त के साथ और अनीता (1967) मनोज कुमार के साथ कीं। दोनों फिल्मों की हिरोइन साधना डबल रोल में थी, संगीतकार एक बार फिर मदन मोहन ही थे। फिल्म मेरा साया का थीम सोंग तू जहाँ जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा और नैनो में बदरा छाए जैसे गीत आज भी दिल को छुते हैं। अनीता (1967) से कोरियोग्राफर सरोज खान को मौका मिला था। सरोज खान उन दिनों के मशहूर डांस मास्टर सोहन लाल की सहायक थी, गाना था झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में इस गाने को आवाज दी दी थी आशा भोंसले ने। उस दौर में जब यह यह गाना स्क्रीन पर आता था तो दर्शक दीवाने हो जाते थे और परदे पर सिक्कों की बौछार शुरू हो जाती थी जिन्हें लुटने के लिए लोग आपस में लड़ जाते थे। इस फिल्म के गीत भी राजा मेंहदी अली खान ने लिखे थे। कहते हैं कि साधना को नजर लग गयी जिससे उन्हें थायराॅयड हो गया था। अपने ऊँचे फिल्मी कैरियर के बीच वो इलाज के लिए अमेरिका के बोस्टन चली गयी। अमेरिका से लौटने के बाद, वो फिर फिल्मी दुनिया में लौटी और कई कामयाब फिल्में उन्होंने की। इंतकाम (1969) में अभिनय किया, एक फूल माली इन दोनों फिल्मों के हीरो थे संजय खान। बीमारी ने साधना का साथ नहीं छोड़ा अपनी बीमारी को छिपाने के लिए उन्होंने अपने गले में पट्टी बंधी अक्सर गले में दुपट्टा बांध लेती थी, यही साधना आइकन बन गया था और उस दौर की लड़कियों ने इसे भी फैशन के रूप में लिया था। साल 1974 में गीता मेरा नाम रिलीज हुई, जो उनकी आखिरी कमर्शियल हिट थी, इस फिल्म की निर्देशक स्वयं थी और इस फिल्म में भी उनका डबल रोल था। सुनील दत्त और फिरोज खान हीरो थे। साधना की कई फिल्में बहुत देर से रिलीज हुई। 1970 के आस पास अमानत को रिलीज होना था, लेकिन वो 1975 में रिलीज हुई, तब बहुत कुछ बदल चुका था। 1978 में महफिल और 1994 में उल्फत की नयी मंजिलें।


साधना ने 6 मार्च, 1966 को निर्देशक आरके नैयर के साथ शादी कर ली जो 1995 में हमेशा के लिए उनका साथ छोड़ गये। इस शादी से साधना के पिता खुश नहीं थे। आरके नैयर दमे के मरीज थे। साधना के कोई संतान नहीं हुई। साधना की चचेरी बहन बबिता ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा। यह बात और है कि बबिता अपनी बहन से बहुत ज्यादा प्रभावित थी। लिहाजा उन्होंने ने भी साधना स्टाईल को अपनाया। बबिता ने फिल्म अभिनेता रंधीर कपूर से शादी कर फिल्मों को अलविदा कह दिया। अपने फिल्मी करियर को लेकर साधना बहुत संजीदा थीं। हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए आईफा द्वारा 2002 में लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है। कई हिंदी फिल्मों में उनके पिता का रोल उनके सगे चाचा हरी शिवदासानी ने किया था।

साधना की प्रमुख फ़िल्में 

1955 में श्री 420, 1958 में अबाणा, 1960 मे लव इन शिमला, 1960 में परख, 1961 में हम दोनों, 1962 में एक मुसाफिर एक हसीना, 1962 में प्रेम पत्र, 1962 में मन मौजी, 1962 में असली नकली, 1963 में मेरे मेहबूब, 1964 में वो कौन थी, 1964 में राजकुमार, 1964 में पिकनिक, 1964 में दूल्हा दुलहन, 1965 में वक्त, 1965 में आरजू, 1966 में मेरा साया, 1967 में अनीता, 1968 में स्त्री, 1969 में सच्चाई, 1969 में इंतकाम, 1969 में एक फूल दो माली, 1970 में इश्क पर जोर नहीं, 1971 में आप आये बहार आई, 1972 में दिल दौलत दुनिया, 1973 में हम सब चोर हैं, 1974 में गीता मेरा नाम, 1974 में छोटे सरकार, 1974 में वंदना,  1975 में अमानत, 1978 में महफिल, 1987 में नफरत, 1988 में आखरी निश्चय और 1994 में उल्फत की नयी मंजिलें।

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