शिवपुराण से……. (267) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की, ऋषियों की तथा दक्ष कन्याओं की संतानों का वर्णन तथा सती और शिव की महत्ता का प्रतिपादन

गतांक से आगे……..

तात! तत्पश्चात् संकल्प से उत्पन्न हुए धर्म मेरी आज्ञा से मानवरूप धारण करके साधकों की प्रेरणा से साधन में लग गये। इसके बाद मैंने अपने विभिन्न अंगों से देवता, असुर, आदि के रूप में असंख्य पुत्रों की सृष्टि करके उन्हें भिन्न-भिन्न शरीर प्रदान किये। मुने! तदन्तर अन्तर्यामी भगवान् शंकर की प्रेरणा सेे अपने शरीर को दो भागों में विभक्त करके मैं दो रूपवाला हो गया। नारद् आधे शरीर से मैं स्त्री हो गया और आधे से पुरूष। उस पुरूष ने उस स्त्री के गर्भ से सर्व साधन समर्थ उत्तम जोड़े को उत्पन्न किया। उस जोड़े में जो पुरूष था, वही स्वायम्भुव मनु के नाम से प्रसि( हुआ। स्वायम्भु मनु उच्च कोटि के साधक हुए तथा जो स्त्री हुई, वह शतरूपा कहलायी। वह योगिनी एवं तपस्विनी हुई। तात् मनु ने वैवाहिक विधि से अन्यन्त सुन्दरी शतरूपा का पाणि ग्रहण किया और उससे वे मैथुनजनित सृष्टि उत्पन्न करने लगे। उन्होंने शतरूपा से प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र और तीन कन्याएं उत्पन्न कीं। कन्याआंे के नाम थे-आकूति, देवहुति और प्रसूति। मनु ने आकूति का विवाह प्रजापति रूचि के साथ किया। मझली पुत्री देवहुति कर्दम को ब्याह दी और उत्तानपाद की सबसे छोटी बहिन प्रसूति प्रजापति दक्ष को दे दी। उनकी संतान परम्पराओं से समस्त चराचर जगत् व्याप्त है।
रूचि से आकूति के गर्भ से यज्ञ और दक्षिणा नामक स्त्री-पुरूष का जोड़ा उत्पन्न हुआ। यज्ञ के दक्षिणा से बारह पुत्र हुए। मुने! कर्दम द्वारा देवहूति के गर्भ से बहुत से पुत्रियां उत्पन्न हुई। दक्ष के प्रसूति से चौबीस कन्याएं हुईं।

(शेष आगामी अंक में)

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