शिवपुराण से……. (266) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

सृष्टि का वर्णन……………..

गतांक से आगे……..

मेरी आज्ञा से इस कार्य में प्रवृत्त होने के कारण तुम्हें मोह माया नहीं बांध सकेगी।
मुझसे ऐसा कहकर श्रीमान् भगवान् नीललोहित महादेव मेरे देखते-देखते अपने पार्षदों के साथ वहां से तत्काल तिरोहित हो गये।

(अध्याय 15)

स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की, ऋषियों की तथा दक्ष कन्याओं की संतानों का वर्णन तथा सती और शिव की महत्ता का प्रतिपादन

ब्रह्माजी कहते हैं-नारद! तदन्तर मैंने शब्दतन्मात्रा आदि सूक्ष्म भूतों को स्वयं ही पंजीकृत करके अर्थात उन पांचों का परस्पर सम्मिश्रण करके उनसे स्थूल आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी की सृष्टि की। पर्वतों, समुद्रों और वृक्षों आदि को उत्पन्न किया। कला से लेकर युगपर्यन्त जो काल विभाग हैं, उनकी रचना की। मुने! उत्पत्ति और विनाश वाले और भी बहुत से पदार्थों का मैंने निर्माण किया। परन्तु इससे मुझे संतोष नहीं हुआ। तब साम्ब शिव का ध्यान करके मैंने साधनपरायण पुरूषों की सृष्टि की। अपने दोनों नेत्रों से मरीचि को, हृदय से भृगु को, सिर से अंगिरा को, व्यानवायु से मुनिश्रेष्ठ पुलह को, उदान वायु से पुलस्त्य को, समान वायु से वसिष्ठ को, अपान से क्रतु को, दोनो कानों से अत्रि को, प्राणों से दक्ष को, गोद से तुमको, छाया से कर्दम मुनि को तथा संकल्प से समस्त साधनों के साधन धर्म को उत्पन्न किया। मुनिश्रेष्ठ! इस तरह इन उत्तम साधकों की सृष्टि करके महादेव की कृपा से मैंने अपने आपको कृतार्थ माना।

(शेष आगामी अंक में)

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