मानव विवेक

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक दिन स्वामी परमहंस शिष्यों के साथ नदी किनारे टहल रहे थे। उन्होंने देखा कि पास ही कुछ मछुआरे जाल फेंककर मछलियाँ पकड़ रहे थे।  उत्सुकतावश वह मछुआरों के और निकट जाकर खड़े हो गए और अपने शिष्यों से बोले-तुम लोग इस जाल में फँसी मछलियों की हलचल गौ़र से देखो। शिष्यों ने देखा कि कुछ मछलियाँ ऐसी थीं, जो जाल में निश्चल थी। वे अपनी नियति मानकर निकलने की कोई कोशिश भी नहीं कर रही थीं, जबकि कुछ मछलियाँ लगातार जाल से निकलने की कोशिश में उछलकूद मचाये हुई थीं। उनमें से कुछ को निकलने में सफलता मिल गई और कुछ अब निकलने की कोशिश कर रहीं थीं।
     जाल से बच निकल़ी मछलियाँ फिर जल में खेलने में मस्त हो गयीं। जब परमहंस ने देखा कि शिष्य मछलियों को देखने में मगन होकर दूर निकल गए हैं तो उन्हें अपने पास बुलाया और बोले-जिस प्रकार मछलियाँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं, उसी तरह मनुष्य भी। पहली श्रेणी ऐसे मनुष्यों की, जिनकी आत्मा ने बंधन स्वीकार कर लिया है। जो अब इस भवजाल से निकलने की नहीं सोंचते। दूसरी श्रेणी ऐसे मनुष्यों की है, जो वीरों की तरह प्रयत्न तो करते हैं, पर बंधन-मुक्ति से वंचित रह जाते हैं। तीसरी श्रेणी में ऐसे व्यक्ति आते हैं, जो प्रयत्न द्वारा अन्ततः मुक्ति पा ही लेते हैं, लेकिन दोनों में एक श्रेणी और होती है, जो खुद को बचाये रखती है।
 एक शिष्य ने पूछा-गुरुदेव वह श्रेणी कौन सी है? हां यह बात महत्लपूर्ण है। इस श्रेणी के मनुष्य उन मछलियों की भांति हैं, जो जाल के कभी निकट ही नहीं आतीं और जब वे जाल परिधि के निकट ही नहीं आतीं तो उनके फँसने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इसका आशयः है कि मनुष्य को सांसारिक बुराईयों के जाल से सदैव बच के रहना चाहिए।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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