शिक्षा दुरूस्त करने के लिए सभी शिक्षकों की लिखित परीक्षा ले सरकार

कूर्मि कौशल किशोर आर्य, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

नीतीश कुमार की सरकार 4 टांगों (गठबंधन) के कारण कार्यकाल पूरा नहीं करेगी, ऐसा बिहार के शिक्षामित्र नियोजित शिक्षक गण बता रहे हैं। नियोजित शिक्षकों ने 2005 में 1500/- रुपये वेतन पर अपना योगदान बिना किसी मेरिट और लिखित परीक्षा के दिया था। तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 3-6 महीने में लिखित परीक्षा आयोजित करके पास होने वाले शिक्षकों को पदोन्नति और फेल होने वाले को बाहर करने की बात की थी, पर 3-6 और 6 महीने से साल बीतने के बाद भी लिखित परीक्षा आयोजित नहीं की गई। साल बीत कर 15 साल हो गये, पर नीतीश सरकार ने नियोजित शिक्षकों जो ज्यादातर बिना मेरीट वाले ही हैं, उनसे बिहार की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव होने के सपने देखते रहें। इधर नियोजित शिक्षकों के महत्वाकांक्षा, अरमान बढ़ते गये। समय के साथ नियोजित शिक्षकों के वेतन 1500/- से बढ़ाकर 30,000/- कर दिये गये पर इससे नियोजित शिक्षकों का दिल नहीं भरा। वे लिखित परीक्षा पास करके शिक्षक बने और पूर्व के वरिष्ठ शिक्षकों के वेतन जैसा समान वेतन की मांग कर रहे हैं, इसके लिए उन्होंने नारा दिया -” समान काम समान वेतन ” पर ये नियोजित शिक्षक अपने मेरीट और लिखित परीक्षा की बात कभी नहीं करते हैं। सच्चाई यही है कि अगर शिक्षक जैसे इनके लिखित परीक्षा लिये जाये तो मुश्किल से 5% शिक्षक ही पास हो पाएंगे। ऐसे में बिहार सरकार लाख प्राथमिक और मध्य विद्यालय तथा हाई स्कूल की शिक्षा व्यवस्था दुरूस्त करने की बातें करें और चाहे कितनी भी धनराशी खर्च करे शिक्षा दुरूस्त नहीं होने वाली है। जब तक कि मेरीट वाले शिक्षकों की नियुक्ति नहीं कर ली जाती है।
नियोजित शिक्षकों ने अभी बिहार विधान सभा चुनाव में खुलकर राजद के युवराज तेजस्वी यादव के पक्ष में महौल बनाया, क्योंकि उसने समान काम समान वेतन देने की बात कही। नियोजित शिक्षक गण तेजस्वी यादव के झांसा में आकर राजद के कार्यकर्ता, नेता की तरह राजद के लिए वोट मांगा है। ये नियोजित शिक्षक 30,000/- रुपये वेतन नीतीश कुमार की सरकार से पा रहे हैं, पर काम तेजस्वी यादव को जिताने के लिए किये हैं। इन्हें याद नहीं है कि कैसे 6-9 महीनें तक राजद के शासन काल में शिक्षकों व नगर निकाय के कर्मचारियों को वेतन नहीं दिये जाते थे और ये लोग हर वर्ष 3-4 बार सामूहिक हड़ताल पर चले जाते थे। हमें याद रखना चाहिए कि अटल बिहारी वाजपेयी ने केन्द्र में 24 दलों (टांगों) वाली सरकार सफलता पूर्वक चलाई थी। उसके बाद उनकी नकल कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए डाॅ मनमोहन सिंह जी की सरकार ने गठबंधन सरकार चलाई और बिहार में राजद ने भी वैसा ही किया। जिस सरकार ने जो काम किये हैं, उसे ईमानदारी से निष्पक्षता पूर्वक स्वीकार करना चाहिए। जैसे हम बैक वार्ड को जगाने का श्रेय पूर्व मुख्यमंत्री माननीय कर्पूरी ठाकुर और लालू प्रसाद यादव को देते हैं, पर इस वर्ग के साथ साथ दलित और महादलित समेत अन्य पिछड़े और अन्य समाज के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व और विकास के साथ मजबूती करने का श्रेय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को देते हैं। यह बिहार समेत देश दुनियां के लोग जानते हैं, वैसे आप भी सच्चाई को स्वीकार कीजिए।  राज्य या केन्द्र के कर्मचारियों द्वारा वैसी सरकार, जिसने उन्हें नौकरी -रोजगार दिया है, वेतन समय समय पर बढायें हैं, वैसे नियोजित शिक्षकों द्वारा सरकार के खिलाफ शंखनाद करना और काम करके खुलेआम वोट नहीं देकर नेता और सरकार को दोबारा नहीं जिताने के लिए अपील करना बेईमान और गद्दार होने के प्रमाण देते हैं। ऐसे निजी स्वार्थ को प्राथमिकता देने वाले नियोजित शिक्षक और अन्य लोगों से उस राज्य की जनता को सावधान रहना चाहिए, क्योंकि जिस 10वीं के अंक पत्र के आधार पर मुखिया /प्रधान से मिलकर ले-देकर उस समय 2005 में 1500/- और 2000/- रुपये पर शिक्षामित्र की नौकरी पाये थे, उस समय उस पंचायत में और भी मेरिट वाले हाई अंक वाले लोग मौजूद थे। जो लोग उस समय पंचायत के मुखिया /प्रधान से सांठ गांठ करने में कामयाब हो गये वे आज 30,000/- रुपये वेतन पा रहे हैं। इतना ही नहीं और ज्यादा समान वेतन भी मांग रहें हैं। अगर निष्पक्ष एजेन्सी से जाँच कराई जाये तो 95% मुखिया /प्रधान और शिक्षामित्र नियोजित शिक्षक लेन देन करके नौकरी देने और नौकरी पाने के आरोप सिद्ध होकर जेल जाएंगे। हो सकता है इस पर बिहार की सरकार काम भी शुरु कर दे। जिन शिक्षामित्र नियोजित शिक्षकों के पास नैतिकता, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा नहीं वो विद्यार्थियों को क्या पढा़एंगे?
संस्थापक राष्ट्रीय समता महासंघ 

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