महिषमर्दिनी का साक्षात रूप हैं माँ मृकुला देवी

राज शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

जहां रखा है रक्त से भरा काली माता का खप्पर

सृष्टि के आरम्भ से ही हिमाचल प्रदेश अपने अलौकिक सौंदर्य के लिए विख्यात रहा है। यहां के पर्वत नदियां झीलें एवं प्राकृतिक ऐतिहासिक धरोहरें सत्यम शिवम सुंदरम की इस पंक्ति को सार्थक करती है। इसके साथ ही यहां की प्राकृतिक खूबसूरती से ओतप्रोत दिव्य तपोस्थल जिनका जिक्र पौराणिक ग्रन्थों में भी मिलता है। जी हां! हम बात कर रहे हैं, मृकुला देवी धाम के बारे में। देवी का यह अद्भुत मन्दिर हिमाचल प्रदेश के जिला लाहुल-स्पीति के उदयपुर में स्थित है। इस अलौकिक दिव्य स्थल का इतिहास तीन युगों से जुड़ा हुआ माना जाता है। मृकुला माता का यह मंदिर समुद्रतल से 2723 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। हिमाचल के अन्य मंदिरों से अलग इस मंदिर की नायाब शैली श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। यह मन्दिर कश्मीरी कन्नौज पहाड़ी शैली में बनाया गया है। इस मंदिर का कलियुग में निर्माण राजा प्रताप सिंह वर्मन ने किया था, जो मूलतः चम्बा का शासक था। प्रथम बार द्वापरयुग के उत्तरार्द्ध कालीन समय अवधि में पांडवों के द्वारा इस मंदिर का निर्माण किया गया था।

एक ही दिन में हुआ था इस मंदिर का निर्माण

कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण एक दिन में ही किया गया था। कथा के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के समय में हिमाचल में बहुत समय व्यतीत किया था । ये मन्दिर भी पांडवों द्वारा निर्मित बताया जाता है। महाबलशाली महाबली भीम ने एक विशाल वृक्ष को जड़ समेत उखाड़ कर लाया। उसी वृक्ष से इस मंदिर का निर्माण किया गया था और धर्मराज के आवाहन पर देवशिल्पी विश्वकर्मा जी ने स्वयं इस मंदिर का निर्माण अपनी अलौकिक दिव्य शक्तियों के द्वारा एक दिन में ही किया था। मृकुला देवी को माता महाकाली के रूप में पूजा जाता है। कहते हैं कि महिषासुर का वध करने के बाद महिषासुर के रक्त को माता महाकाली ने एक खप्पर में रख दिया था। वह खप्पर आज भी यहां माता काली की मूर्ती के पीछे रखा हुआ है। इस खप्पर को श्रद्धालुओं के देखने पर 1905 से प्रतिबंध लगाया हुआ है। यहां के लोगों की आस्था है कि अगर इस खप्पर को कोई गलती से भी देख ले तो वह अंधा हो जाता है।
स्पीति घाटी में वर्ष में एक बार फागली का पारम्परिक महोत्सव मनाया जाता है ।उत्सव की पूर्व संध्या पर माँ मृकुला देवी मंदिर के पुजारी खप्पर की पूजा अर्चना की अदायगी अकेले ही करते हैं। खप्पर को बाहर निकाला जाता है, लेकिन कोई देखता नहीं है। जनश्रुति के अनुसार वर्ष 1950 में इस खप्पर को देखने वाले 4 लोगों की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए बुझ गई थी। 16 वी शताब्दी से पहले इस गांव का नाम मरगुल था, परन्तु जब चम्बा के राजा उदय सिंह लाहुल आए तो राजा ने  देवी की मूर्ति की स्थापना की। इसके बाद गांव का नाम उदयपुर रखा गया । यह गांव चंद्रभागा नदी के किनारे बसा है। हिंदू देवी मृकुला या महाकाली के महिषासुर मर्दिनी माता के नाम से पूजा अर्चना करते हैं। बौद्ध धर्म के लोग माता वृकुला नाम से वर्णित वज्रराही के रूप में पूजते हैं। बौद्धों का मानना है कि यह वही स्थान है, जहां पर सिद्ध तांत्रिक संत पदम संभव ने अपनी यात्रा के दौरान ध्यान लगाया था। मंदिर के प्रांगण में 1 क्विंटल करीब ढाई मन वजन का एक पत्थर है, जिसे उठाना तो दूर हिलाने में भी पसीने छूट जाते हैं। यह पत्थर भीम के लिए रखा गया था। भीम अपने चारों भाइयों का सारा भोजन चट कर जाते थे। ऐसे में उन्हें इस पत्थर के वजन के बराबर एक समय का भोजन देते थे, ताकि बाकी पांडव भूखे ना रह सके।

बेजोड़ नायाब नक्काशी के लिए विख्यात है माता मृकुला का यह धाम

अद्भुत नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है महाकाली मृकुला देवी का यह ऐतिहासिक मंदिर। प्राचीन इतिहास के अलावा मृकुला देवी मंदिर को अपनी अद्भुत और उत्कृष्ट नकाशी के लिए भी जाना जाता है, यही कारण है कि यह मंदिर कला प्रेमियों के बीच में एक अहम स्थान रखता है। बाहर से देखने पर यह मंदिर कुटीर की तरह साधारण सा दिखता है, लेकिन मन्दिर के भीतरी कक्ष में जाने पर आपको कला की एक अन्य दुनिया से मिलने का मौका मिलता है। मन्दिर में जो नक्काशी की गई है वह विभिन्न शताब्दियों में बनाई गई है। मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित माता की मुख्य मूर्ति बाहर से ही नजर आ जाती है। प्रतिमा कक्ष का दरवाजा छोटा है इसलिए माता के चरणों तक पहुंचने के लिए झुक कर जाना होता है। मूर्ति का निर्माण 1580 में किया गया था। सिंह पर सवार माता महाकाली को महिषासुर पर प्रहार करते हुए दर्शाया गया है। मंदिर में दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं से संबंधित चित्र दर्शाए गए हैं। यहां भीतरी कक्ष में लक्कड़ पर अद्भुत नक्काशी की गई है, जिसमे शर शय्या पर आसीन भीष्म पितामह, गंगा-यमुना, चक्रव्यूह में अभिमन्यु, भगवान श्री कृष्ण अर्जुन, द्रौपदी स्वयंवर, नवग्रह, भगवान विष्णु के अवतार, त्रिभुवनपति भगवान शिव सहित अनेक देव शक्तियों के चित्र बनाए गए हैं। मन्दिर के द्वारपाल हनुमान जी और भैरव जी को भी चित्रित किया  गया है। पुरातत्व विभाग इस मंदिर का रखरखाव करता है।
मंदिर की दीवारें लकड़ियों की बनाई गई है, लेकिन इन्हें पहाड़ी शैली में बनाया गया है। कहा जाता है कि इस मंदिर में महिषासुर राक्षस का वध करने के बाद महाकाली यहां आई और रक्त से भरा खप्पर यहां रख दिया । माना जाता है कि आज भी यह खप्पर मंदिर में महाकाली की मुख्य मूर्ति के पीछे रखा गया है । जो वर्ष में विशेष पूजा के निमित बाहर निकलता है। लेकिन इसे भक्तजन देख नहीं सकते । लोगों में आस्था हैं कि कहीं गलती से भी इस खप्पर को कोई देख ले तो वह अंधा हो सकता है । साथ ही इस मंदिर में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालुओं को यहां का एक राज भी बताया जाता है, ताकि कोई भी अंदर जाकर वह गलती न दोहराए। श्रद्धालुओं को बताया जाता है कि यहां पूजा अर्चना और दर्शन के बाद भूल कर भी “चलो यहां से चलते हैं” नहीं बोल सकते हैं। माना जाता है कि ऐसा बोलने पर आप और आपके परिवार पर भारी विपत्ति आ सकती है। ऐसा कहने पर इस मंदिर के दीवार पर खड़े दोनों द्वारपाल भी साथ चल पड़ते हैं।
संस्कृति संरक्षक आनी कुल्लू हिमाचल प्रदेश

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