रीतिकाल के दोहे

डॉ. दशरथ मसानिया,  शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

भूषण चिंता लाल कवि, बोधा केशवदास।
बिहारीआलम ग्वाल कवि,ठाकुर रस मतिराम।।१
पद्माकर घन देवही, सेनापति ऋतु गान।
रीतिकाल के रसिक हैं,ब्रजभाषा विद्वान।।२
सम्वत सत्रह से चला, उन्निस तक अभियान।
रीतिकाल को जानिये, कहत हैं कवि मसान।।३
कवित्त सवैया कुंडली,दोहा छंद अपार।
सिंगारी सब कवि भये,अलंकार भरमार।।४
बावन पौथी देव रचि,रीतिकाल सरदार।
भावा प्रेमा चंद्रिका,राधा रत्नाकार।।५
पद्माकर के छंद से, साहित हुआ निहाल।
अनुप्रास अलंकार की,शोभा रही अपार।।६
जग विनोद पद्माभरण,गंगा लहरि पचास।
राम रसायन पदम के,भक्त भावना ग्वाल।।७
अकबर के दरबार में,टोडरमल महराज।
बीरबल चतुराई की ,चर्चा होती आज।।८
अकबर के दरबार में ,एक कवि थे गंग।
रहीमदास साथ रहे,गज ने चीरा अंग।।९
देव रतन कवि चंद्रिका, गीत रसि जहंगीर।
केशव के है सात ग्रंथ,रीतिकाल के पीर।।१०
दोहा चौपइ में लिखा,महभारत का गान।
जन जन की वाणी बने, सबलसिंह चौहान।।११
सेनापती ऋतु साजते, कवित्त रत्नाकार।
शब्द अर्था अलंकृता,दुनिया में उजियार।।१२
भूषण चिंता मतिराम, तीनों साहित साज।
भूषण वीर अवतार है ,मति हैं रस के राज।।१३
गिरधर कवि तो कह गये,नीति कुंडली छंद।
जो नर नीति मानते,पड़ते नाही फंद।।१४
छंद सार ऋतुराज अरु,लक्षण साहित सार।
मतिराम सतसई लिखी,रस सिंगार अपार।।१५
रस सारांश भिखारि का, काव्य छंद का सार।
चिंता कविकुल कल्पतरु,काव्य विवेक सिंगार।१६
सुजान विरह कृपाकांड, घनानंद रसकेलि।
रतन हजारा रसनिधी, हिंडोला अरु बेलि।।१७
सतसैया बिहारी रचि,काव्य रूप सिंगार।
दोहा छंद रचना करि,ब्रज भाषा आधार।।१८
गागर में सागर भरा,सतसैया सा सार।
प्रेम प्रेमिका भेद करि,मुक्तक रूप निखार।।१९
बीस दोह में लिख दिया, रीति काल का हाल।
भूल चूक को सुधारिये, कहत हैं कवि मसान।।२०
23, गवलीपुरा आगर, (मालवा) मध्यप्रदेश

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