तारक मेहता का सीधा चश्मा

प्रीति शर्मा “असीम”, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

मनु जब भी टीवी लगाती है, अक्सर तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखती है। उसका पसंदीदा सीरियल है, काफी समय से मीनाक्षी भी घर के कामों में यदा-कदा थोड़ा बहुत तारक मेहता का उल्टा चश्मा देख ही लेती है। कभी कोई एपिसोड लगा होता है तो कभी कोई… अक्सर कई सवाल सोच को कुरेद जाते हैं।  सच में तारक मेहता का उल्टा चश्मा है जिसमें हर चीज…. हर रिश्ता….. हर त्यौहार…..हर दिन…..हर परेशानी बहुत खूबसूरत है। गोकुलधाम में सब कितने प्यार से रहते हैं कितने प्यार से एक दूसरे को सुनते हैं। समझते हैं….. हर त्यौहार को कितनी खुशी से कितने चाव से मनाते हैं। संपूर्ण भारत को एक धाम में……… गोकुलधाम में फिर वह त्योहार चाहे किसी भी मजहब का हो किसी भी धर्म का हो किसी अन्य राज्य का हो या विदेश का हो।

हर त्यौहार को बड़ी खूबसूरती के साथ उमंग के साथ श्रद्धा और प्रेम के साथ मनाते हैं हर दिन को जिंदादिली से मुस्कुराते हुए शुरू करते हैं और मुश्किलों का भी मुस्कुराते हुए ही समाधान निकाल लेते हैं। लेकिन यह तारक मेहता का उल्टा चश्मा है जिसमें सारी समस्याएं बड़ी से बड़ी चुटकियों में सुलझा ली जाती है हंसते – हंसते। लेकिन अगर तारक मेहता का चश्मा सीधा करके देखें तो वह दिखेगा…… जहां सुबह हंसते- हंसते नहीं होती। लोग हंसने से कतराते हैं। बने हुए मुंह जैसे कह रहे हो। फिर सुबह हो गई। नहीं समझते……. कि आपके चेहरे की मुस्कान कितनी समस्याओं को खत्म कर सकती है, अगर तारक मेहता सीधा करके चश्मा देखता….. तो देखता कि कैसे लोग एक ही घर में अजनबीयों की तरह रहते हैं बिना एक -दूसरे की संवेदनाओं को बिना एक दूसरे की संवेदनाओं का एहसास किए। बिना एक दूसरे से सरोकार रखें लेकिन सामाजिक तौर पर किसी के मरने या भोग पर इकट्ठे हो जाते हैं, शादियों में हंसते हुए बड़े -बड़े परिवारों को साथ लेकर बड़ी-बड़ी फोटो खिंचवाते हैं। लेकिन मनों की खींचातानी को अपने मनों में छुपा कर एक दूसरे से खींचे ही रह जाते हैं। देखता उन बच्चों को जो संस्कार को आउटडेटेड बताते हैं। मां -बाप सब कुछ करते हुए भी आपने क्या किया। जब यह शब्द सुनते हैं और वह बच्चे जो अपने बचपन में ही जिम्मेदारियों के बोझ से बचपन में ही बूढ़े हो जाते हैं। रोटी कमाने की क्या कीमत होती है उम्र भर नहीं भूल पाते हैं। वह बेटियां जो मां-बाप की इज्जत के लिए ससुराल के तानों को सहते हुए मर जाती है और कुछ मर -मर कर जीती रहती है और कुछ ऐसी बेटियां जो मां -बाप की इज्जत की परवाह ना किए हुए आशिकी के लिए घर से भाग जाती हैं।

अगर तारक मेहता का सीधा चश्मा करके देखता तो त्योहारों में जो उल्लास खुशी एक मध्यवर्गीय परिवार में बहुत मुश्किल से आती है अपनी स्थितियों को और समाज में अपने दायरे को बनाए रखने के लिए 8 महीने से कोरोना महामारी में बेरोजगार बैठे दीवाली पर बच्चों को पटाखे भी घर का कुछ सामान बेचकर आते हैं। सड़कों पर सामान बेच – बेच कर त्योहारों में बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं। तारक मेहता के उलटे चश्में में सभी महिलाओं के किरदार सम्मानित हैं लेकिन उसी चश्मे को अगर सीधा करके देखा जाए तो कुछ ऐसी तिरस्कार पाती महिलाएं भी हैं जो पति से हमेशा अपमान ही पाती है सात फेरों की सजा जिसमें सिर्फ मौत ही रिहाई होती है….क्यों कि वह महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं होती वह नहीं कमा पाती इसलिए घर के काम करने के भी नौकरानी से ज्यादा बदतर जिंदगी को गुजारती हैं उनकी खुशियां पति के खुश रहने तक ही सीमित है अगर पति खुश है तो सब ठीक है सुखी संसार का लेबल लगा के सारी उम्र काट देती हैं लेकिन सच का सामना नहीं कर पाती और कुछ महिलाएं इसी अवसाद में जीवन के एक पड़ाव में तमाम रिश्तो को जीवन से निकालती हुई इस तरह खुद से उदासीन हो जाती हैं फिर करवाचौथ जैसी प्रथाओं का कोई मूल्य नहीं रह जाता जब पति-पत्नी एक-दूसरे का सम्मान ही नहीं करते। वह सास जो अच्छी बहू को भी सम्मान नहीं दे पाती नहीं समझ पाती, सात फेरों में मिली मुफ्त की नौकरानी……यह क्या करती है, कोई काम ढंग से नहीं आता,इतने कपड़े सिलवाती है….. इसके आने से तो बरकत ही चली गई है। यही बातें होती है उसकी तारीफ करने के लिए और कुछ ऐसी बहुएं जो सात फेरों के इस गरिमा पूर्ण संस्कार को तार-तार कर जाती है, पूरे घर को क्लेश का केंद्र बना कर बस अपने कमरे तक सीमित हो जाती है। तब लगता है कि हमारा समाज बच्चों के विवाह करता ही …….क्यों है ऐसा क्लेश जिसमें आप समाज क्या कहेगा ऐसे रिश्तों को ढोते हैं….जो मरे हुए हैं जिनमें अपनापन नहीं है….. लेकिन अपने हैं। यह अपनेपन की कौन- सी परिभाषा है।

समाज का ऐसा रूप जिसमें सत्य का पाठ तो पढ़ाया जाता है, लेकिन सत्य को किस तरह से अपने अनुकूल बना कर उसका इस्तेमाल करना है अपने हित में यह तरीके पहले निकाल लिए जाते हैं। शायद तारक मेहता का चश्मा उल्टा है इसलिए गोकुलधाम की दुनिया उसे बहुत सुंदर शालीन दिखती है लेकिन हकीकत में जब चश्मा सीधा करके देखेंगे तो जिंदगी बड़ी मुश्किल से जिंदगी नजर आती है।

नालागढ़, हिमाचल – पंजाब

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