आत्म नियन्त्रण

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक बार भगवान बुद्ध एक गाँव में उपदेश दे रहे थे। उन्होंने कहा कि हर किसी को धरती माता की तरह सहनशील और क्षमाशील होना चाहिए। हमें अपने आवेश और क्रोध पर नियन्त्रण कर इस धरा पर शान्ति और प्रेम  का माहौल बनाने का प्रयास करना चाहिये, क्योंकि क्रोधी व्यक्ति जो दूसरे को जलायेगा और खुद भी जल जायेगा। सभा में एक स्वभाव से अतिक्रोधी व्यक्ति पहले से ही बैठा हुआ था। उसे ये सारी बातें बेतुकी लग रही थीं। अचानक ही भावनाओं से नियंत्रण खोते ही वह आग बबूला खड़ा होकर बोला-तुम पाखण्डी हो, बडी़-बड़ी बाते करना ही तुम्हारा काम है। सभा में सन्नाटा छा गया। तथागत बुद्ध ने बहुत ही शान्ति से उसे सुना, लेकिन वह व्यक्ति उनके कुछ कहने से पूर्व ही बड़बड़ाता हुआ गुस्से में वहाँ से चला गया।
रात में लेटे लेटे उस क्रोधी व्यक्ति को अपने व्यवहार पर बहुत पछतावा हुआ। वह तथागत से क्षमा माँगने के लिए बेचैन हो उठा। जैसे-तैसे सुबह हुई। वह सीधा उस स्थान पर पहुँचा जहाँ कल बुद्ध सभास्थल था। लेकिन वहाँ तो सर्वत्र सन्नाटा था, तथागत वहाँ से जा चुके थे, लेकिन उसने निश्चय कर लिया था कि बुद्ध भगवान चाहें कहीं मिलें, उनसे मिलकर, क्षमा मांगकर ही अब उसे शान्ति मिलेगी। आखिकार वह व्यक्ति उन्हें ढूँढता हुआ दूर दूसरे गाँव जा पहुँचा, जहाँ आज तथागत प्रवचन दे रहे थे। उन्हें देखते ही वह सीधा प्रभु के चरणों में गिर पड़ा और जोर जोर से रोते हुए  क्षमा माँगने लगा। बुद्ध ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा-कौन हो भाई ? ऐसे विचलित होकर क्षमा याचना करने का कारण क्या है? तथागत के मधुर स्वर सुनते ही जैसे उसकी चेतना लौटी, वह बोला-क्या आप भूल गये ? भगवन! मैं वही क्रोधी, पापी इन्सान हूँ, जिसने कल सभा में आपका अपमान किया था। प्रभु! कल से मुझे पल भी चैन नहीं मिला है। जब आप मुझे क्षमा करेंगे, तभी मैं स्थिर और शान्त हो पाऊँगा।
भगवान बुद्ध ने प्रेमपूर्वक उससे कहा-बीता हुआ कल तो मैं वहीं छोड़कर आ गया और तुम अभी वहीं अटके हुए हो। तुम्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, तुम बेचैन हुए और आँखों से बहती पछतावे की ये निर्मल धारा तुम्हें पूरी तरह से कोमल व मधुर बना चुकी है। अब बीते कल को भूल जाओ और आज अच्छे नये विचारों के साथ जीवन के पथ पर चलना ही सर्वदा उचित होगा। जो बीत गया, उसे बुरे सपने की तरह भूल जाओ।  प्रभु वाणी से उसका सारा बोझ उतर गया। उसने तथागत के चरण पकड़कर क्रोध को त्याग कर क्षमाशीलता का संकल्प लिया।  बुद्ध ने उसके मस्तिष्क पर आशीष का हाथ रखा।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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