जीवन अनमोल है

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक बार नेपोलियन अपने सैनिकों से बिछड़ कर एक गांव में पहुंच गया। तभी उसे अपनी और आते रूसी सैनिक नजर आए। वह जान बचाने के लिए एक दर्जी की दुकान में घुस गया।  दर्जी ने फुर्ती से नेपोलियन को एक कालीन में लपेट दिया। रूसी सैनिक दुकान में घुसकर नेपोलियन को तलाश करने लगे, एक सैनिक ने तो अपनी तलवार ही कालीन में घुसेड़ दी। फिर सैनिक ढूँढकर चले गए तो दर्जी ने नेपोलियन को सही सलामत पाने पर चैन की सांस ली। नेपोलियन दर्जी से बोला-मैं फ्रांस का सम्राट हूं और तुम्हारी मदद के लिए कृतज्ञ हूं।  मैं तुम्हारी तीन इच्छाएं पूरी कर सकता हूं। दर्जी बोला-महाराज!  मेरी दुकान की छत टपकती है, आप मरम्मत करा दें । नेपोलियन बोला-दूसरी इच्छा बताओ।  दर्जी बोला-पड़ोस में एक और दर्जी है, उसे आप कहीं और चले जाने को सहमत कर दें। नेपालियन बोला-तुम मुझसे कुछ भी मांग सकते थे, फिर ये छोटी इच्छाएं पूरी करने को क्यों कह रहे हो?

दर्जी साहस कर बोला-मैं जानना चाहता हूं, कि जब रूसी सैनिक की तलवार कालीन में आपके सामने गुजरी तो आपको कैसा लगा? तभी नेपोलियन के सैनिक वहां आ पहुंचे। उन्हें देखते ही नेपोलियन बोला-इस दर्जी को मौत के घाट उतार दो, इतना कह कर वह घोड़े पर सवार हो चला गया। सैनिक गोली चलाने वाले ही थे कि नेपोलियन का सेनापति दौड़ते हुए आया और बोला-सम्राट ने इसे क्षमा कर दिया है। सैनिकों ने अपनी बन्दूकें नीची कर लीं। मौका देख कर दर्जी भागने ही वाला था कि सेनापति ने उसे एक कागज के साथ मोहरों से भरी थैली देकर कहा-सम्राट ने तुम्हारे लिये भिजवाई है। उस कागज पर लिखा था, शायद मुझसे पूछे सवाल का जवाब अब तो तुम्हें मिल गया होगा कि कैसा लगता है, जब गर्दन पर तलवार हो?

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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