शान्त चित्त

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

संत के आश्रम में उनसे मिलने शाही अंदाज में एक राजकुमार आया। वह बुद्धि से होशशियार और चंचल मन था। टिक कर बैठना, या देर तक खाली बैठना उसे अच्छा नहीं लगता था। उसने आश्रम में आते ही संत से पूछा-मुझे ज्ञान हासिल करने के लिए ध्यान करने की क्या जरूरत है? मैं पढ़ सकता हूँ, जप कर सकता हूँ, प्रार्थना कर सकता हूँ। मैं सभी विषयों पर ढंग से सोंच सकता हूँ। फिर ये फिजूल में ही, दिम़ाग को खाली करने और शान्त करने जैसी बाते क्यों की जाती हैं।
संत मुस्कराये और राजकुमार को खुले प्रांगण में ले आये। उन्होंने अपने साथ एक एक चौड़ा बर्तन भी ले लिया और उसे जमीन पर रखकर पूरी तरह पानी से भर दिया। बर्तन को इस स्थित में रखा कि चन्द्रमा को पानी में देखा जा सके। अब संत ने पानी में उंगली चलाई और उससे पूंछा-तुम इस जल में क्या देख पा रहे हो? राजकुमार ने कहा-इसमें रोशनी की कई लहरें दिखाई दे रही हैं। कुछ प्रतीक्षा के बाद जब जल शान्त हो गया, तब संत ने सवाल किया-अब तुम इसमें क्या देख पा रहे हो?
राजकुमार ने कहा-चाँद। संत ने कहा-हे युवा राजकुमार! ज्ञान को प्राप्त करने का सही तरीका शान्त और ठहरे हुए चित्त से ही सम्भव है। शान्त होने के बाद ही चीजें वैसी दिखती हैं, जैसी वे हैं। चंचल युवा राजकुमार अब ध्यान की महत्ता को ठीक से समझ गया और अमल करने को तत्पर हो गया। हमें जो भी कार्य मिले, उसे पूरी एकाग्रता, लगन से करना चाहिए।
 राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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