विरासत और कला का उत्कृष्ट प्रमाण है धवास का दड़ैश झाखड़ी मंदिर

डॉ जगदीश शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हिमाचल प्रदेश के मण्डी-करसोग मार्ग पर स्थित एक छोटा सा पड़ाव आता है बीठरी। यहां से कटवाची-खातीधार होकर खलवाड़-पैहना भूण्डल, माँझा भुण्डल होकर शिरा भुण्डल को छोटे वाहन योग्य रास्ता जुड़ता है। माँझा भुण्डल प्राचीन गीहनाग के कारण प्रसिद्ध है। खलवाड़ से लगभग दो-अढ़ाई किलोमीटर की चढ़ाई छोटे वाहन द्वारा तय करने के बाद इस कोठी तक पहुँचा जा सकता है। यहां गींहनाग भुण्डल की भव्य कोठी निर्माणाधीन है। गींहनाग जी का मंदिर  मशोगल पंचायत के अन्तर्गत बरनोग नामक स्थान के पास धवास की “दड़ैश झाखड़ी” में है। मंदिर के चारों ओर मंदलोई नामक अद्भुत अमरबेेल तथा शमशाद नामक वृक्षों का घना वन है, जो इस शांत,एकांत तपस्थली के सौंदर्य को बढ़ाता है। इस दुर्गम क्षेत्र के इतिहास संस्कृति और यहाँ के लोक जीवन का सजीव अध्ययन कर लौटे पुरातत्व चेतना संघ मंडी द्वारा स्वर्गीय चंद्रमणी कश्यप राज्य पुरातत्व चेतना पुरस्कार से सम्मानित डाक्टर जगदीश शर्मा, पूर्व उप मंडलाधिकारी/संयुक्त आयुक्त द्वारा स्वच्छता के लिए प्रदेश सरकार के पंचायती राज मंत्री के कर कमलों से खंड स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित सुमित गुप्ता, समाजसेवी युवा प्रेरक विज्ञान अध्यापक पुनीत गुप्ता और मुख्य स्त्रोत व्यक्ति मान सिंह ठाकुर जी का कहना है कि काष्ठ कला शिल्पियों की अनवरत साधना का उत्कृष्ट  प्रमाण यह मंदिर शताब्दियों पुरानी समृद्ध परंपरा, उन्नत संस्कृति से इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों, पुरातत्वविदों और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर गौरवमय अतीत के दर्शन करवाता है।
18 देव स्थलियों के संस्कृति मर्मज्ञ गूर रामचु राम जी का कहना है कि इस मंदिर में भगवान विष्णु जी शेषनाग जी की गींहनाग जी के रूप की गई स्थापना के विषय में एक अद्भुत किंवदंती प्रचलित है। गींहनाग जी कुलह मलौण के पास चौकीधार में जोगिनियों (स्वर्ग की अप्सराओं) के साथ द्रुत क्रीड़ा करते थे। सभी अप्सराओं को हराने के बाद नागदेव बरनोग गांव पहुंचे। यहां नागदेव ने राठी खानदान के एक बुजुर्ग को स्वप्न में दर्शन देकर दड़ैश झाखड़ी में पानी की उत्पत्ति कर अपने प्राक्ट्य की बात कही। अगले दिन जब वह राठी बुजुर्ग  गांव वालों के साथ दड़ैश झाखड़ी पहुंचा तो उसने स्वप्न में देवता की बात को सत्य पाया। अगली रात पुनः देवता ने राठी को फिर स्वप्न में  दर्शन दिये तथा दड़ैश झाखड़ी में हजारों वर्षों से दबी पड़ी मूर्ति को निकाल कर उद्धार करने का आदेश दिया। गांव वालों ने मिलकर जल की उत्पति के स्थान पर तालाब का निर्माण करने के बाद गांव वासियों के सहयोग से निर्दिष्ट स्थान से मूर्ति को भूमि से निकालकर मंदिर का निर्माण कर इसे वैदिक मंत्रों से गर्भगृह में स्थापित कर दिया। गीहनाग भुण्डल की अपनी “हार” (प्रजा क्षेत्र) कणेज, बह, शणोग, घदीह, काण्ढलु, थलीथाच, धवास भुण्डल सहित अनेक गांव वासियों के दिलों में अटूट विश्वास और श्रद्धा है।
भुण्डल निवासी राजकीय माडल वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला पांगणा के प्रधानाचार्य संजय ठाकुर का कहना है कि वर्ष में दो बार नाग देवता को “नया नेसा”(नवान्न) अर्पित करने की सदियों पुरानी अलौकिक परंपरा का आज भी निर्वाहन किया जाता है। इसी अवसर पर गर्भगृह का द्वार भी नाग देवता के दर्शनार्थ खोला जाता है। देवता का देव के तालाब के पानी और गंगाजल से स्नान कर “कलया” (विशेष श्रृंगार) किया जाता है। नये चावल को ऊखल मे कूट कर पहाड़ी नस्ल की गाय के घी के साथ गुंथकर मुकुट, कुंडल बनाकर चंदन और “पठावे”(देवदार के पीले परागकणो) की मालाएं बनाकर धूप-दीप नैवेद्य से नीति नियम के साथ पूजा अर्चना कर सभी अपनी मन्नौतियां अर्पित करते हैं। नाग देवता के साथ जल देवता, माता अच्छरा, देवगण तोगड़ा और झोर की भी पूजा अर्चना की जाती है। चार वर्ष बाद गींहनाग जी की रथयात्रा ढोल-नगाडों-करनाल-नरसिंघो-गुज्हू-शहनाई की दिशाभेदी देवधुनो वातावरण को गुजारने करते हुए अपने लाव-लश्कर के साथ पैदल फेर (परिक्रमा/दिग्बंधन) को निकलती है तो जहाँ- जहाँ  से भी रथयात्रा गुजरती है। भक्तगण बड़े हर्षोल्लास से
गींहनाग भुण्डल जी के श्री विग्रह का का स्वागत कर पूजा-अर्चना कर देव श्री विग्रह  के चरणों  में मन्नौतियाँ अर्पित कर स्वयं  को धन्य करते हैं। यह रथयात्रा पारंपरिक रूप से सबसे पहले छोलगढ़ फिर बह, कणेज खातीधार, घदोह, कोटला, कांढलु, शरल, बरनोग-2 होकर शिराभुण्डल पहुंचती है। इस दौरान अनेक स्थानों  पर देवता के सम्मान में जातर व रात्रि जागरण का आयोजन  होता है, जिसमें देवबेड़ के बाद देवलु और गांव वासी रातभर अलाव के चारों ओर बाहों में  बाहें डालकर पहाड़ी नाटी नृत्य करते हैं। इस नृत्य  में  नाटी के विभिन्न रूपों को अभिव्यक्त करते हुए शरीर और मन की ऊर्जा का अद्भुत आनंद दिन भर की लंबी थकान को विराम मिलता है। 19-20 वैशाख को गींहनाग भुण्डल जी का देवरथ कटवाची मेले में शामिल होता है।  गींहनाग भुण्डल जी के इस सुप्रसिद्ध प्राक्ट्य स्थल दड़ैश झाखड़ी मंदिर, देवकोठी, शरल स्थित देवगण तोगड़ा जी के देओरे तथा देवोत्सवो की व्यवस्था के लिए कमेटी का गठन किया गया है। इस कमेटी में टेकसिंह प्रधान, परम उप प्रधान, टेकचंद सचिव, अमर सिंह कोषाध्यक्ष, खीमाराम गींहनाग भुण्डल के पुजारी तथा क्षेत्र के अनेक पुस्तैनी समाजसेवी कारदार, कुठियाला, भण्डारी और अनेक सक्रिय सदस्य हैं। सुकेत संस्कृति  साहित्य एवं जन कल्याण मंच पांगणा के अध्यक्ष डाक्टर हिमेन्द्रबाली ‘हिम” का कहना है कि हिमाचल प्रदेश का साँस्कृतिक वैभव मौलिकता और पारम्परिक लिए हुए है। पहाड़ी प्रदेश हिमाचल में संस्कृति के संरक्षण और उन्नयन के सार्थक प्रयासों की अपरिहार्यता है, इसी उद्देश्य के फलितार्थ समय-समय पर दुर्गम देव स्थलों की पद यात्रा कर क्षेत्र विशेष के देवी-देवताओं के इतिहास, देव संस्कृति से जुड़ी परंपराओं के संकलन का प्रयास किया जा रहा है। आज के भौतिकवादी युग में पराभौतिक सोच क्षीण होती जा रही है। परिणाम स्वरूप धर्म स्थलों एवं इनसे जुड़ी परम्पराएं विलुप्त होती जा रही हैं। साथ ही साथ धर्म मूलक मानवगत संस्कार और रीति-रिवाज भौतिकता के अंधड़ में मिटता जा रहे हैं। अतः संस्कृति के क्षयो-मुखी परिप्रेक्ष्य में आज विश्व संस्कृति प्रसूता भारतीय संस्कृति का संरक्षण आवश्यक हो गया है।
पांगणा करसोग मण्डी हिमाचल प्रदेश

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