अपना अपना कल्पनालोक

कुँवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

कवि बिहारी लाल कहते है- ज्यों आंखिन सबु देखियै, आंखि न देखि जाहिं।। अर्थात हम अपनी आँखो से विशाल दुनिया देखते हैं, पर अपनी ही आंखों को नहीं देख पाते। देखने वाले को दर्शक कहा जाता है। इस दर्शक के दो अर्थ हैं-देखनेवाला और दिखानेवाला। यही दर्शक साहित्य में सहृदय और सामाजिक कहलाता है, काव्य या नाटक का रस लेता है। यही दर्शक राजनीति में जनतंत्र का आधार बनता है, जिसके मंच पर राजनेता अपना मजमा सजाते हैं और  तरह तरह से मदारी के करतब दिखाते हैं। यह शास्त्रों के बड़ा कीमती शब्द है। इसने ही षट्दर्शन अर्थात छः प्रकार के दर्शनों की रचना की है। तमाम महान दार्शनिकों ने संसार को अपने अपने चश्में से देखा है। मीमांसको ने कहा कि ईश्वर नहीं है। चार्बाक ने परलोक को नकार दिया। भगवान बुद्ध ने सर्व क्षणिकं क्षणिकं, सर्व दुखं दुखं माना। सनातन धर्म ने मनुष्य को ईश्वर और मूर्तियों से जोड़ा।
कहते हैं एक बार कार्ल मार्कस ने अपने दार्शनिक एक मित्र से चिढ़कर एक किताब लिखी-द पावर्टी आफ फिलास्फी तो दार्शनिक ने भी जवाब में किताब लिखी-द फिलासफी आफ पॉवटीं। हर सोंचने वाला प्रायः अपने सिद्धान्त को ही सही समझता है और उसको प्रमाणिक बनाने के लिए तर्क भी गढ़ लेता है। एक और सुन्दर दर्शन जैन धर्म में मिलता है-अनेकांतवाद। महावीर स्वामी ने अनेकातवाद को सत्याग्रही प्रवृत्ति माना। यानि किसी च़ीज का आग्रह नहीं रखना चाहिए। हर एक के पास सत्य का कुछ ना कुछ अंश होता है।
 मनुष्य के पास बुद्धि और हृदय का बल है। बुद्धि विचार करती है, हृदय अनुभव करता है और दोनों  का संतुलन ही जीवन को पूर्णता प्रदान करता है। इसी से हमारा दृष्टिकोण बनता है। हमारा नजरिया अगर सच है तो शायद दूसरो का भी सच हो सकता है। सबसे जुड़ें और सबको जोड़ें। यही उदारता और सही मानवता की डगर है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ।

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