शिवपुराण से……. (264) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)


सृष्टि का वर्णन………….

तब भगवान् शंकर की आज्ञा से एक रजोगुणी सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अर्वाक्स्त्रोता कहा गया है। इस सर्ग के प्राणी मनुष्य हैं, जो पुरूषार्थ साधन के उच्च अधिकारी हैं। तदन्तर महादेव जी की आज्ञा से भूत आदि की सृष्टि हुई। इस प्रकार मैंने पांच तरह की वैकृत सृष्टि का वर्णन किया है। इनके सिवा तीन प्राकृत सर्ग भी कहे गये हैं, जो मुझ ब्रह्मा के सानिध्य से प्रकृति से ही प्रकट हुए हैं। इनमें पहला महत्तत्व का सर्ग है, दूसरा सूक्ष्म भूतों अर्थात तन्मात्राओं का सर्ग है और तीसरा वैकारिक सर्ग कहलाता है। इस तरह से ये तीन प्राकृत सर्ग हैं। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकार के सर्गों को मिलाने से आठ सर्ग होते हैं। इनके सिवा नवां कौमार सर्ग है, जो प्राकृत और वैकृत भी है। इन सबके अवान्तर भेद का मैं वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि उसका उपयोग बहुत थोड़ा है।
अब द्विजात्मक सर्ग का प्रतिपादन करता हूं। इसी का दूसरा नाम कौमार सर्ग है, जिसमें सनक-सनन्दन आदि कुमारों की महत्वपूर्ण सृष्टि हुई है। सनक आदि मेरे चार मानस पुत्र हैं, जो मुझ ब्रह्मा के ही समान हैं। वे महान् वैराग्य से सम्पन्न तथा उत्तम व्रत का पालन करने वाले हुए। उनका मन सदा भगवान् शिव के चिन्तन में ही लगा रहता है। वे संसार से विमुख एवं ज्ञानी हैं। उन्होंने मेरे आदेश देने पर भी सृष्टि के कार्य में मन नहीं लगाया। मुनिश्रेष्ठ नारद! सनकादि कुमारों के दिये हुए नकारात्मक उत्तर को सुनकर मैंने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया। उस समय मुझ पर मोह छा गया। उस अवसर पर मैंने मन ही मन भगवान विष्णु का स्मरण किया।

(शेष आगामी अंक में)

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