शिवपुराण से……. (265) गतांक से आगे…….रूद्र संहिता (प्रथम सृष्टिखण्ड़)

सृष्टि का वर्णन……………..

वे शीघ्र ही आ गये और उन्होंने समझाते हुए मुझसे कहा-तुम भगवान् शिव की प्रसन्नता के लिए तपस्या करो। मुनिश्रेष्ठ! श्रीहरि ने जब मुझे ऐसी शिक्षा दी, तब मैं महाघोर एवं उत्कृष्ट तप करने लगा। सृष्टि के लिए तपस्या करते हुए मेरी दोनो भौहों और नासिका के मध्य भाग से, जो उनका अपना ही अविमुक्त नामक स्थान है, महेश्वर की तीन मूर्तियों में से अन्यतम पूर्णांश, सर्वेश्वर एवं दयासागर भगवान् शिव अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए।
जो जन्म से रहित, तेज की राशि, सर्वज्ञ तथा सर्वस्रष्टा है, उन नीललोहित नामधारी साक्षात् उमावल्लभ शंकर को सामने देख बड़ी भक्ति से मस्तक झुका उनकी स्तुति करके मैं बड़ा प्रसन्न हुआ और उन देवदेवेश्वर से बोला-प्रभो! आप भांति-भांति के जीवों की सृष्टि कीजिये। मेरी यह बात सुनकर उन देवाधिदेव महेश्वर रूद्र ने अपने ही समान बहुत से रूद्रगणों की सृष्टि की। तब मैंने अपने स्वामी महेश्वर महारूद्र से फिर कहा-देव! आप ऐसे जीवों की सृष्टि कीजिये, जो जन्म और मृत्यु के भय से युक्त हों। मुनिश्रेष्ठ! मेरी ऐसी बात सुनकर करूणासागर महादेव जी हंस पड़े और तत्काल इस प्रकार बोले। महादेव जी ने कहा-विधातः! मैं जन्म और मृत्यु के भय से युक्त अशोभन जीवों की सृष्टि नहीं करूंगा, क्योंकि वे कर्मों के अधीन हो दुख के समुद्र में डूबे रहेंगे। मैं तो दुख के सागर में डूबे हुए उन जीवों का उद्धारमात्र करूंगा, गुरू का स्वरूप धारण करे उत्तम ज्ञान प्रदान कर उन सबको संसार-सागर से पार करूंगा। प्रजापते! दुख में डूबे हुए सारे जीव की सृष्टि तो तुम्हीं करो।

(शेष आगामी अंक में)

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