बिहार

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

हर साल बाढ़ की विभीषिका झेलता प्रदेश बिहार इस वर्ष चीनी बीमारी से भी लड़ रहा हैँ। तमाम लोग अन्य राज्यों से बेरोजगार होकर बिहार लौटे, उनका दर्द अलग से है और ऐसे कठिन  समय मे प्रदेश में शान्ति और सजगता से सम्पन्न विधान सभा के चुनाव के लिए आम जनता और चुनाव आयोग तथा बिहार प्रशासन बधाई के पात्र हैं। जनता जहाँ सुशासन बाबू के शासन से कुछ बोर थी, दूसरी ओर विपक्ष दस लाख नौकरियों के बन्द पिटारे का स्वप्न दे रहा था। वह सत्तारुढ़ दल पर निष्क्रियता और तरह तरह के आरोप मढ़ रहा था। मतदाता/ जनता, दलों द्वारा फैलाने वाले भ्रमजाल में फँसने की बजाय बड़ी सूझबूझ से सारे वृतान्त पर नज़र गड़ाये मन ही मन निर्णय की ओर बढ़ रही थी, क्योंकि  जनता ने  बिहार में लालटेन से लगी जंगलराज की आग देखी थी। एक टिमटिमाता दिया (चिराग) भी बिहार  में नकरात्मक रोशनी फैलाने में जुटा हुआ था। ये सब अपने घरपरिवार की पार्टियों के चश्मों चिराग थे। जो एक प्रा.लिमि. कम्पनी की तर्ज पर चलते हैं। आखिरकार चुनाव परिणाम जनादेश फिर जनता ने एनडीए के पक्ष में दे दिया।  परिवारवाद, जातिवाद और तुष्टिकरण की कुटिल चालें जनता ने अस्वीकार कर दीं।
नीतिश कुमार और मोदी के वायदों पर सबसे ज्यादा भरोसा महिलाओं ने किया।  और उनके समर्थन से विजय सुनिश्चित हूई। हारे हुए विपक्ष ने सदा की तरह ही EVM के साथ ही DM पर हेराफेरी के आरोप लगा दिये।  लेकिन हारे विपक्ष ने परिवक्य जनता के फैसले पर नतमस्तक होने की बजाय, अपनी जिमम्मेदारी लेने से बचने के लिए बहानों का सहारा लिया। नीतिश बाबू फिर एक बार बिहार के सिरमोर बनेंगे, यह तय है, लेकिन कम सीटें आने का दंश भी सहना पडेगा। ऐसे में गठबंधन की सरकार को पाँच साल तक ठीक ठाक चलाने की चुनौती रहेगीँ।
राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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