शुभकामनाएँ

मनमोहन शर्मा, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

ओले कोविद के
इस कदर बरसे
कि इस धन तेरस पर
सब धन को तरसे
भयभीत निगाहें ताकती
आसमां पर
जाने कब किधर से
क्रूर बादल गरजे?
था वक्त
इल्जाम बेवफाई का
लगता रहा जब गैंरो पर
आज अपने ही
अपनों की मौका-ए-
अलविदाई को तरसे
देख इंसानों की भीड़ भरी
साँसें छीन रहा अरि
इस दिवाली पटाखे त्यागें
प्रेम, संवेदना, विश्वास के
दीप ताकि जगमग जागें
फूँक फूँक कदम बढ़ाएँ
सोचकर निकलें घर से
दीप जलाएँ
दिवाली मनाएँ
कबूल करें
मेरी शुभकामनाएँ
अर्ज करें ज़रूर ईश्वर से
कि जग मुक्त हो
कोरोना के डर से
कुसुम्पटी शिमला-9, हिमाचल प्रदेश

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