सौदागर

कुंवर आरपी सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

एक संत फकीर कहीं जा रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें एक सौदागर मिला, जो 5 गधों पर बड़ी-बड़ी गठरियां लादे हुए जा रहा था। गठरियां बहुत भारी थीं, जिन्हें गधे बड़ी मुश्किल से ढो़ पा रहे थे। फकीर ने जिज्ञासावश सौदागर से प्रश्न किया-इन गढ़रियों में तुमने ऐसी कौन सी चीजें रखी हैं, जिन्हें यह बेचारे गधे ढो़ नहीं पा रहे हैं? सौदागर ने जवाब दिया-इनमें इंसान की इस्तेमाल की चीजें भरी हुई हैं। इन्हें बेचने मैं बाजार जा रहा हूं। फकीर ने पूछा-अच्छा! कौन-कौन सी चीजें हैं, जरा मुझे भी बताइए? क्या पता मुझ खानाबदोश के काम की भी हों। सौदागर ने कहा-यह जो पहला गधा आप देख रहे हैं, इस पर अत्याचार की गठरी लदी हैं। फकीर ने पूछा-भला अत्याचार कौन खरीदेगा? सौदागर ने कहा-इसके खरीदार राजा ,महाराजा और सत्ताधारी लोग हैं। काफी ऊंची दर पर इसकी बिक्री होती है। अच्छा! फकीर ने पूछा-इस दूसरी गठरी में क्या है? सौदागर बोला-यह गठरी अहंकार से लबालब भरी है, और खरीदार हैं पंडित और विद्वान। ओह ! और तीसरे गधे पर ईर्ष्या की गठरी रखी है तथा इसके ग्राहक हैं वे धनवान लोग जो एक दूसरे की प्रगति को बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसे खरीदने के लिए तो लोगों का तांता लगा रहता है। फकीर ने विस्मय से पूछा-अच्छा भाई चौथी गठरी में क्या है ? सौदागर ने कहा-इसमें बेईमानी भरी है। इसके ग्राहक वह कारोबारी हैं, जो बाजार में धोखे से की गई बिक्री से काफी मोटा मुनाफा कमाते हैं। इसलिए बाजार में इसके खरीदार भी तैयार खड़े हैं। फकीर ने पूछा-और आखरी गधे में पर क्या लदा है ? सौदागर ने जवाब दिया-इस गधे पर छल कपट से भरी गठरी रखी है। और इसकी मांग उन लोगों में बहुत ज्यादा है, जिनके पास घर में कोई अपनाकाम धंधा तो है नहीं और जो सिर्फ छल कपट का सहारा लेकर दूसरों की लकीर छोटी कर अपनी लकीर बड़ी करने की कोशिश में लगे रहते हैं, ऐसे लोग ही इसके खरीदार हैं। सौदागर ने फकीर से पूछा-बताओ तुम्हें क्या दूँ? फकीर ने सहजता से कहा-भाई! इनमें से कोई भी च़ीज मेरे काम की नहीं है, इनसे तो मैं ऐसे ही ठीक हूँ।

राष्ट्रीय अध्यक्ष जय शिवा पटेल संघ

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