90 प्रतिशत आबादी हमारी, फिर कैसे सरकार तुम्हारी

कूर्मि कौशल किशोर आर्य, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

भारत में जातीय विद्वेष को बढ़ावा और सामन्तवादी विखंडनकारी नीति को विदेशी यूरेशियन जाति के लोगों ने अपने निजी स्वार्थ को पूरा करने और लम्बे समय तक शासन करने के लिए साजिश करके स्थापित किया था। भारत के 90 प्रतिशत बहुसंख्यक बहुजन मूलनिवासी समाज को 6743 विभिन्न जातियों में बांटकर उन्हें असंगठित रहने के लिए मजबूर कर दिया। इसी का परिणाम है मुट्ठी भर 10 प्रतिशत की आबादी वाले लोग भारत पर लम्बे समय से शासन कर रहे हैं और बहुसंख्यक समाज को विकास और अधिकार तथा सुविधाओं के नाम पर ठेंगा दिखा रहे हैं। यह बातें हमारे 90 प्रतिशत बहुजन समाज को समझ में ही नहीं आ रही है। पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज के 90 प्रतिशत लोग आपस में ही लड़ाई करके अपनी ऊर्जा को एक-दूसरे का खून बहाने में लगा रहे हैं। सैंकड़ों समाज सुधारकों ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज को जागरूक और संगठित करने के लिए संदेश दिये हैं और आज भी संदेश दे रहे हैं, परन्तु यह 90 प्रतिशत समाज के लोग जागरूक और संगठित होकर शारीरिक, आर्थिक, शैक्षणिक, वैचारिक, मानसिक, बौद्धिक और राजनैतिक रूप से मजबूत होकर सत्ता पर अधिकार करने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे हैं। इसमें बाधक कुछ पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज के तथाकथित नकली, स्वार्थी नेता और जनप्रतिनिधि तथा अफसर भी हैं, जो खुद को सवर्ण जाति की ही श्रेणी में मानकर अपनी 90 प्रतिशत आबादी वाले समाज का नुकसान कर रहे हैं।
भारत में 90 प्रतिशत वोट बहुजन समाज का है, परन्तु नेता, जनप्रतिनिधि, मंत्री, अफसर, जज, पत्रकार पद पर 10 प्रतिशत की आबादी वाले लोग ही काबिज हैं। यह असमानता, अव्यवस्था, अत्याचार और अन्याय नहीं तो और क्या है? 90 प्रतिशत बहुजन समाज के लोग वोट देकर 10 प्रतिशत वालो को अपना रहनुमा बनाकर उनसे न्याय की भीख मांगते हैं। यह कैसी मानसिकता और समझदारी है? देश के सभी राजनैतिक दलों में 10 प्रतिशत वाले सबल और सम्पन्न लोगों को ही आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। यह तब तक चलता रहेगा, जब तक 90 प्रतिशत बहुसंख्यक समाज अपने अधिकारों और ताकत को नहीं समझ लेता।

संस्थापक राष्ट्रीय समता महासंघ

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