बेअसर होती दुआएँ

प्रभाकर सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

दुआएँ ही क्यों, अब पता नहीं क्या-क्या बेअसर हो रहा हैं? वो दिन गए जब बाबा लोग हाथ मे जल लेकर लोगों को जला देते थे। पता नहीं बड़े-बड़े तपस्वी बाबाओं को इतना गुस्सा क्यों आता था? जो आध्यात्मिक रूप से समृद्ध है, भला उसको गुस्सा क्यों आता है? जब बड़े-बड़े धर्म के जानकारों से भी पूछो तो उन्हें भी गुस्सा आने लगता है कि बाबा लोगों के बारे में टिप्पणी कैसे कर सकते हो? हम तो डर जाते हैं कि कहीं ये वाले बाबा जी भी हाथों में जल लेकर श्राप दे दें तो गए काम से।
दुआओं का तो पता नहीं, लेकिन दवाएं जरूर बेअसर हो रहीं हैं। अब जब हेल्थ इंडस्ट्री का एकमात्र उद्देश्य लाभ होगा, न कि शुभ लाभ होगा तो दवाएं कैसे असर करेंगी? दिल्ली में तो ऐसी भी उड़ती खबरें हैं कि कोरोना की टेस्टिंग लैब्स अस्पतालों से सांठ-गांठ करके कोविड नेगेटिव वालों को भी पॉजिटिव बना देती हैं।
जब मैंने लैब्स से दरख्वास्त की, कि भईया इतना भी मत पॉजिटिव हो जाइए तो लैब्स वाले बोले-बॉस! आप अंदर की बात समझे नहीं। यह सारे इकॉनमी बूस्टर मैसर्स हैं। लोग जब पॉजिटिव आएंगे, तभी वे दवाईयां खरीदेंगे और फार्मा इंडस्ट्री आगे बढ़ेगी और अन्य इंडस्ट्रीज को पुश करेगी और इकनॉमी नेगेटिव ग्रोथ से पॉजिटिव ग्रोथ की ओर जाएगी। मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका ।
मतलब नकली दवाएं बाजार में आसमानी दामों पर बेंची जाएंगी तो आपकी जेब भले ही खाली होगी और दवाओं का उल्टा असर होगा, लेकिन कुछ की जेब भरेगी और इकॉनमी भी बूस्ट करेगी। मुझे लगता है इकॉनमी के इस नए नियम पर नीति आयोग को ध्यान देना चाहिए। इसे अमिताभ बच्चन की भाषा मे कह सकते हैं कि सेट बैक का जवाब कम बैक से देना। इसलिए हे देश वासियों! विश्व गुरू के कुटुंब वालों, Be positive। सब मोह- माया है। ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या ।
असर और बेअसर होने में भी एक पतली रेखा है। कब क्या असर कर जाए पता नहीं चलता? जैसे आजकल सोशल मीडिया पर संवाद हो गया है। कहा कुछ जाता है और समझा कुछ। संवाद की जगह वाद और विवाद की प्रस्तावना हो जाती है। यह तब और खतरनाक हो जाता है, जब आप कभी मिले न हों। यदि दोस्ती, यारी और रिश्तेदारी सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित हो। ऐसे में कहा जाता है आम और समझा जाता है अमरूद। पता लगा कि दिया गया प्रेमपत्र, लेकिन समझा लिया गया है बारूद।
बेअसर होने की लिस्ट बनाई जाए तो एक लंबी लिस्ट बन जाएगी जो बेअसर हो रहा है। अक्सर हम सबको लगता है कि देश मे कानून बेअसर हो रहा है। सच में यह एडवेंचर की बात हो गई, किसने कितनी बार लाल बत्ती तोड़ी? कौन कितनी बार जेल गया? मतलब धीरे-धीरे संविधान भी बेअसर हो रहा है। वे खबरें जो दिल की संवेदनाओं को झकझोर देती थीं। अब उन्हें पन्ने पलट कर भूल जाते हैं, हम सब।
पहले कभी कोई अनशन या भूख हड़ताल पर होता था तो शासन-प्रशासन तुरंत अनशन तुड़वाने के लिए बातचीत में जुट जाता था। सड़क की बात विद्युत गति से संसद तक पहुँचती थी, लेकिन अब स्थिति अलग हो गयी है। अब तो सड़कें चिल्लाती हैं, लेकिन संसद के कान पर जूं नहीं रेंगता है। सड़क की भी बात बेअसर है। पहले नेताओं को ही समझते थे कि बोलने के लिए बोलता है, लेकिन अब हम सब भी नेता बन गए हैं, बोलने के लिये कुछ भी बोल देते हैं, लेकिन उसका कोई मतलब नहीं होता है। उसमें कोई असर नहीं होता है।
जनता तो बस असर और बेअसर के द्वंद में ही जिन्दगी बसर कर रही है। वैसे यह पब्लिक है सब जानती है, लेकिन जानबूझकर पब्लिक मस्त है, क्योंकि शायद पब्लिक भी मतलबपरस्त है। अब पब्लिक पर किसी बात का असर तभी होता है, जब वह प्रत्यक्ष रुप से प्रभावित होता है, नहीं तो तमाशा देखता है।
असर और बेअसर के इस खेल में बस यही दुआ है कि कोरोना बेअसर हो जाए और जो वैक्सीन या दवाई है, वह असरदार निकले। पता नहीं दिल से निकली यह दुआ कितनी असरदार होंगी। बस जिन्दगी में पॉजिटिव रहें और कोविड नेगेटिव। चलते-चलते कट जाएंगे, मुश्किल भरे यह रास्ते ।

शोधार्थी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी प्रयागराज

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