सामंती लाठी से पिटता लोकतंत्र

प्रभाकर सिंह, शिक्षा वाहिनी समाचार पत्र।

लोकतंत्र और सामंत जब आमने -सामने आते हैं तो दोनों में टकराहट स्वाभाविक है। लोकतंत्र कहता है समानता और सामंत कहता है साम या समानता का अंत। लोकतंत्र कभी हिंसा में विश्वास नहीं करेगा, वह मत को बहुमत बनाकर फ़ैसले लेना चाहेगा तो वहीं सामंत कभी नहीं चाहेगा कि समानता हो और असामनता स्थापित करने के लिए अपनी लाठी भाँजता रहेगा। सामंतवाद डरा धमकाकर लोकतंत्र के चारों पायदानों के सिर पर बैठकर लोकतंत्र को सामंती हथियारों से चलाता रहता है। मतलब गाड़ी है लोकतंत्र की, लेकिन चलाते हैं सामंत। अब, जब समाज ही सामंती हो तो राज या राजनीति कहाँ लोकतांत्रिक हो सकती है? फिर तो बस लोकतंत्र के फूल कहीं खिले नहीं कि कोई सामंती राजकुमार फूल लेकर चला नहीं। तब तो सिर्फ़ लोकतंत्र के फूल को खिलाने वाले भौंरे देखते रहेंगे और कुछ चूसे हए फूल भौंरे के सामने फेंक देंगे, फिर बासी फूल के इर्दगिर्द भौंरा मंडराएगा और खुश होकर गाएगा-

भौरें ने खिलाया फूल ,फूल को ले गया राजकुमार ।

बिल्कुल उसी तरह जिसमे कहा जाता है कि कर्म किए जाइये और फल की चिंता मत कीजिए। राजकुमार से याद आया कि राजतंत्र के ही राजकुमार नहीं लोकतंत्र के भी राजकुमार होते हैं, जिस पर लोकतंत्र के जन न्योछावर हुए रहते हैं। प्रधानमंत्री का बेटा प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री का मुख्यमंत्री, एमपी का एमपी और प्रधान का बेटा प्रधान। बिल्कुल जातीय प्रणाली। फिर बात वहीं अटक जाती है कि जैसा समाज वैसी राजव्यवस्था। अब जब ब्रह्मा ने पहले से ही सबका काम फिक्स कर दिया तो लोकतंत्र ने भी उसे अगर थोड़ा बहुत अडॉप्ट कर लिया है तो क्या बुराई है इसमें? अडॉप्टबिली तो अच्छा गुण है। वैसे भी लोकतंत्र धर्म के खिलाफ कैसे जा सकता है और वह भी भारत जैसे देश में जो पूरी तरह धर्मिक है। जहाँ धर्म के पर्दे के पीछे ही बड़े-बड़े कारनामें किए जाते हैं। भारत में सामंत और लोकतंत्र ने एक दूसरे को स्वीकार कर लिया है। फिट हो गए हैं दोनों एक दूसरे के खाँचे में। जहाँ फिट नहीं होता है, वहाँ सामंती लाठी, डंडा, तलवार, कट्टा ,बंदूक, क्रूरता जैसे हथियार भी हैं। इस पर भी अगर लोकतंत्र नहीं मानता है तो सामंत बलात्कार भी कर सकते हैं, लोकतंत्र का। वह कहते हैं कि जब तक आप हमारी हाँ में हाँ मिलाते हैं तो ठीक है, नहीं तो हम आपको मज़बूर कर देंगे। कोई चाणक्य महोदय बता ही गए हैं साम, दाम, दंड, भेद। बस यह कुछ नहीं सामंती हथियार ही तो हैं।
जैसे आप फलाने सामंत को वोट नहीं देंगे तो फलाने जी बूथ कैप्चरिंग करवा लेंगे, फिर चाहे आप वोट दो या न दो। अब ईवीएम है, अब सामंत जी चाहें तो उसमें भी कुछ चेंज करवा सकते हैं और पता लगा कि आप वोट दो कुर्सी को और वोट चला जाए स्टूल को। कहने का मतलब यह है कि जब तक समाज सामंती है, तब तक लोकतंत्र के डंडे चलते रहेंगे और लोकतंत्र का अंग प्रत्यंग टूटता रहेगा। लोकतंत्र तभी फलेगा और फूलेगा, जब समाज लोकतांत्रिक हो और वह तभी होगा, जब परिवार और व्यक्ति लोकतांत्रिक हो जाएगा। लोकतंत्र जी! उठिए और संविधान के नियमों से सामंत के हाथों और पाँवों में हथकड़ियाँ और बेड़ियां डाल दीजिए।

शोध छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश।

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